विपक्षी राज्यों में 'सत्ता विरोधी लहर' और भाजपा शासित राज्यों में 'अजेय कवच': द्रमुक का तीखा प्रहार
भारतीय राजनीति में 'सत्ता विरोधी लहर' का दोहरा मापदंड? द्रमुक ने भाजपा शासित राज्यों की निरंतर जीत को बताया एक 'अनसुलझी पहेली'। क्या विपक्षी राज्यों में छोटी घटनाओं को बड़ा बनाकर सत्ता परिवर्तन का भ्रम फैलाया जा रहा है? जानिए इस राजनीतिक विवाद की पूरी गहराई।

भारतीय राजनीति में सत्ता विरोधी लहर के प्रभाव पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करने वाला ग्राफिक। Image generated by AI for illustrative purposes.
भारतीय राजनीति के बदलते परिदृश्य के बीच द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और चुनावी रुझानों पर एक गंभीर और विचारोत्तेजक बहस छेड़ दी है। द्रमुक का मानना है कि वर्तमान में भारतीय राजनीति एक अत्यंत विचित्र और रहस्यमयी दौर से गुजर रही है, जहाँ मापदंड अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग नजर आते हैं। पार्टी ने तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में छोटी से छोटी कमियों को भी इस तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है जैसे कि वहां 'सत्ता विरोधी लहर' (एन्टी-इंकंबेंसी) का प्रचंड तूफान चल रहा हो। इसके विपरीत, भाजपा शासित राज्यों में आखिर यह लहर लुप्त क्यों हो जाती है? फिल्म 'मुथल मरियाथाई' के उस प्रसिद्ध संवाद की तर्ज पर कि "मुझे सच जानना है", द्रमुक ने इस पूरी स्थिति को एक 'अनसुलझी पहेली' करार दिया है।
द्रमुक समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि भारत के चुनावी मानचित्र का सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए, तो भाजपा के गढ़ माने जाने वाले उत्तरी राज्यों में सत्ता विरोधी मानसिकता का चुनावी परिणामों पर कोई प्रभाव न पड़ना एक चौंकाने वाला तथ्य बनकर उभरा है। उदाहरण के तौर पर, गुजरात में पिछले 30 वर्षों से, यानी 1995 से भाजपा का शासन निर्बाध रूप से जारी है। एक चौथाई सदी बीत जाने के बाद भी वहां सत्ता के खिलाफ कोई प्रभावी लहर न उठना अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इसी तरह, मध्य प्रदेश में पिछले दो दशकों के दौरान (एक संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर) भाजपा निरंतर सत्ता पर काबिज है। हालिया चुनावों में भी वहां सत्ता विरोधी लहर की प्रबल चर्चा थी, लेकिन परिणामों ने उन तमाम कयासों को धता बताते हुए भाजपा को प्रचंड जीत दिला दी।
पार्टी ने उत्तर प्रदेश और असम का भी विशेष उल्लेख किया, जहाँ ऐतिहासिक रूप से किसी एक दल का लगातार दूसरी बार सत्ता में आना अत्यंत कठिन माना जाता था। भाजपा ने उन ऐतिहासिक पदचिह्नों को मिटाते हुए लगातार दूसरी बार सत्ता बरकरार रखकर सबको अचंभित कर दिया है। बिहार की राजनीति का जिक्र करते हुए द्रमुक ने सवाल उठाया कि वहां भी वर्षों से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं, क्या वहां कभी जनता में असंतोष की भावना पैदा नहीं होती? द्रमुक का मुख्य तर्क यह है कि एक बार जब भाजपा किसी राज्य में चुनाव जीत जाती है, तो वहां जैसे सत्ता विरोधी लहर के अस्तित्वहीन होने का एक मायाजाल बुन दिया जाता है। इसके उलट, विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन की पटकथा लगातार लिखी जाती रहती है। द्रमुक का यह विश्लेषण भारतीय राजनीति के दोहरे मानकों और चुनावी मशीनरी की कार्यप्रणाली पर एक गहरा सवालिया निशान खड़ा करता है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
