पुणे में आठ गाड़ियों के काफिले के साथ पहुंचे उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को विपक्ष ने घेरा, कुछ दिन पहले ही बाइक चलाकर दिया था सादगी का संदेश।

Devendra Fadnavis convoy controversy : महाराष्ट्र की राजनीति में शुचिता और सादगी के दावों के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसके केंद्र में राज्य के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं। रविवार को पुणे में आयोजित विभिन्न विकास परियोजनाओं के उद्घाटन के दौरान फडणवीस के आठ वाहनों के विशाल काफिले ने विपक्ष को हमले का एक बड़ा मौका दे दिया है। यह विवाद इसलिए अधिक गहरा गया है क्योंकि महज कुछ दिन पहले, 14 मई को फडणवीस ने मुंबई में अपनी आधिकारिक निवास 'वर्षा' से 'विधान भवन' तक बुलेट बाइक चलाकर ईंधन बचाने और सादगी अपनाने का एक सार्वजनिक संदेश दिया था। आलोचकों का कहना है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सादगी की अपील का समर्थन करना और दूसरी तरफ विशाल काफिले के साथ घूमना उपमुख्यमंत्री की कथनी और करनी में अंतर को स्पष्ट करता है।

घटनाक्रम के अनुसार, देवेंद्र फडणवीस रविवार को पुणे में एक नए कैंसर अस्पताल और करीब तीन लाख निवासियों को लाभान्वित करने वाली पानी की टंकियों के लोकार्पण समारोह में पहुंचे थे। जैसे ही उनका काफिला पुणे स्थित कार्यक्रम स्थल के गेट पर पहुंचा, वहां मौजूद सुरक्षा वाहनों और लग्जरी गाड़ियों की लंबी कतार कैमरे में कैद हो गई। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है क्योंकि यह उसी नेता का काफिला था जिसने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों के बीच प्रधानमंत्री मोदी की 10 मई की मितव्ययिता की अपील का पुरजोर समर्थन किया था। कांग्रेस समर्थकों और विपक्षी दलों ने इस वीडियो को साझा करते हुए इसे 'पाखंड' करार दिया है और सवाल उठाया है कि क्या ईंधन बचाने का संदेश सिर्फ फोटो खिंचवाने तक ही सीमित था।

हालांकि, फडणवीस के समर्थकों और सत्ता पक्ष के नेताओं ने इन आरोपों को निराधार बताया है। बचाव पक्ष का तर्क है कि उपमुख्यमंत्री के साथ इस दौरे पर उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार सहित कई अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी और सुरक्षा बल तैनात थे, जिसके कारण वाहनों की संख्या अधिक होना एक प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी आवश्यकता थी। उनका कहना है कि वीवीआईपी (VVIP) सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत वाहनों की संख्या को कम करना सुरक्षा के नजरिए से संभव नहीं था। इस पूरे विवाद पर सोमवार दोपहर तक फडणवीस या उनके कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं और तेज हो गई हैं।

यह मामला केवल एक राजनेता के काफिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में प्रतीकात्मकता और वास्तविकता के बीच के संघर्ष को भी दर्शाता है। जहां विकास परियोजनाओं के माध्यम से पुणे की जनता को बड़ी सुविधाएं मिली हैं, वहीं काफिले के इस विवाद ने प्रशासनिक उपलब्धियों पर हेडलाइंस का साया डाल दिया है। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या राजनेता जनहित के प्रतीकात्मक संदेशों को अपने दैनिक जीवन और प्रोटोकॉल में किस हद तक उतार पाते हैं, या फिर ये संदेश केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।

Updated On 18 May 2026 6:19 PM IST
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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