कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार को कमान देकर कांग्रेस ने पीढ़ीगत बदलाव के संकेत दिए हैं। तेलंगाना, हिमाचल और केरल में भी नए चेहरे आगे आ रहे हैं।

भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस समय एक बड़े और ऐतिहासिक संगठनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रही है। लंबे समय से वरिष्ठ नेताओं के वर्चस्व और 'अतीतजीवी' होने के आरोपों का सामना कर रही कांग्रेस ने अब अपनी रणनीतियों को समय के अनुकूल ढालना शुरू कर दिया है। कर्नाटक में एक लंबी राजनीतिक खींचतान और मैराथन बैठकों के बाद ७७ वर्षीय सिद्धारमैया की जगह ६४ वर्षीय डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कमान सौंपना केवल एक राज्य का सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह पार्टी के भीतर चल रहे गहरे पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन का स्पष्ट शंखनाद है। पार्टी अब रक्षात्मक राजनीति को छोड़कर आक्रामक रुख अपना रही है, जिसका सीधा असर दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत के राज्यों तक देखा जा सकता है।

इस बड़े संगठनात्मक बदलाव की आवश्यकता तब और महसूस की जाने लगी जब हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ने ४६ वर्षीय नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर एक बड़ा युवा कार्ड खेला। उस समय मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा बीजेपी के इस युवा नेतृत्व की तुलना कांग्रेस के ८० वर्षीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से की जाने लगी थी। हालांकि, कांग्रेस अपनी आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों और क्षेत्रीय सीमाओं के दायरे में रहकर बेहद खामोशी और दूरदर्शिता के साथ इस बदलाव की राह पर आगे बढ़ रही है। केरल में भी पार्टी ने ऐसा ही साहसिक फैसला लिया था, जहां वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और केसी वेणुगोपाल की मजबूत दावेदारी को दरकिनार करते हुए अपेक्षाकृत युवा ६१ वर्षीय वीडी सतीशन को कमान सौंपी गई थी। इस फैसले के पीछे भले ही जमीनी कार्यकर्ताओं और प्रमुख सहयोगी दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का समर्थन एक बड़ा कारण रहा हो, लेकिन इसने साफ कर दिया कि पार्टी अब पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकल रही है।

उत्तर और पश्चिम भारत में बीजेपी के बढ़ते चुनावी और वैचारिक वर्चस्व के बीच कांग्रेस के लिए दक्षिण भारत हमेशा से एक बेहद मजबूत और वफादार गढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि आपातकाल के बाद वर्ष १९७७ के आम चुनाव में जब उत्तर भारत से कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया था, तब भी दक्षिण भारत के राज्यों ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा था। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी तमाम कोशिशों और सांगठनिक संशोधनों के बावजूद बीजेपी दक्षिण भारत के मतदाताओं का मन पूरी तरह नहीं जीत पाई है। हालांकि दक्षिण भारत के पास लोकसभा की केवल १३१ सीटें ही हैं, जिससे सत्ता के राष्ट्रीय समीकरणों की सीमाएं तय होती हैं, लेकिन इन सीटों पर अपना पूर्ण वर्चस्व बनाए रखना कांग्रेस के लिए देश के अन्य हिस्सों की तुलना में काफी आसान है। यही वजह थी कि नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनते समय उम्रदराज होने के बावजूद मल्लिकार्जुन खरगे पर दांव लगाया गया, जो दक्षिण भारत से आते हैं और पार्टी के सभी क्षेत्रीय क्षत्रपों को एक सूत्र में बांधने की क्षमता रखते हैं।

दक्षिण भारत में अपनी स्थिति को अभेद्य किला बनाने के साथ-साथ कांग्रेस उत्तर और पश्चिम भारत में भी नए गठबंधनों के जरिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की दूरदर्शी रणनीति पर काम कर रही है। तमिलनाडु में सिनेमा से राजनीति में आए अभिनेता विजय की नवगठित पार्टी टीवीके के साथ गठबंधन की संभावनाओं को तलाशते हुए कांग्रेस आगामी चुनावों में अपने लिए अधिक लोकसभा सीटों की उम्मीद कर रही है। वहीं दूसरी ओर, आंध्र प्रदेश में पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी के साथ कूटनीतिक नजदीकी बढ़ाने की कोशिशों में जुटी है, जहां जगन की सगी बहन वाईएस शर्मिला को पहले ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर कमान सौंपी जा चुकी है।

वर्ष २०१४ के बाद से लगातार चुनावी पराजयों का सामना कर रही कांग्रेस के भीतर केंद्रीय आलाकमान का वह पुराना दबदबा नहीं रह गया है जो कभी हुआ करता था। इसका सीधा असर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में देखने को मिला, जहां आंतरिक सत्ता संघर्ष के समय केंद्रीय नेतृत्व असहाय नजर आया और राज्यों में सरकारें गंवानी पड़ीं। यही कारण है कि कर्नाटक जैसे महत्वपूर्ण राज्य में सामाजिक समीकरणों के बेहद जटिल होने के बावजूद आलाकमान ने कड़ा फैसला लिया। सिद्धारमैया जो कि कुरुबा समुदाय के एक बेहद प्रभावशाली ओबीसी नेता हैं, उन्हें हटाना राजनीतिक रूप से एक बड़ा जोखिम था क्योंकि बीजेपी इसे ओबीसी विरोधी कदम के रूप में प्रचारित करने के लिए तैयार बैठी थी। कर्नाटक की राजनीति मुख्यतः तीन बड़े समुदायों लिंगायत, वोक्कालिगा और कुरुबा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें लिंगायत पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ हैं जबकि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय के सबसे बड़े चेहरे रहे हैं।

सिद्धारमैया को हटाकर वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले तेजतर्रार नेता डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला आगामी २०२८ के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लिया गया है। कांग्रेस को राज्य में सत्ता बचाए रखने के लिए जिस आक्रामक और सांगठनिक रूप से मजबूत नेतृत्व की जरूरत थी, उस कसौटी पर शिवकुमार पूरी तरह खरे उतरते हैं। केवल कर्नाटक ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश में ६२ वर्षीय सुखविंदर सिंह सुक्खू और तेलंगाना में ५६ वर्षीय रेवंत रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी ने युवाओं को स्पष्ट संदेश दिया है। संगठन में भी बदलाव की यह बयार बह रही है, जहां मध्य प्रदेश में ५२ वर्षीय जीतू पटवारी और आंध्र प्रदेश में ४६ वर्षीय वाईएस शर्मिला जैसे युवा चेहरों को आगे लाया गया है। आने वाले समय में पंजाब और राजस्थान में भी सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं का लंबा इंतजार खत्म होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं, जो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि कांग्रेस अब पूरी तरह नए चेहरों के भरोसे अपनी राजनीतिक तकदीर बदलने के पथ पर अग्रसर है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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