बीजेपी का 'लोकतंत्र बचाओ' अभियान: राहुल गांधी के आक्रामक रुख का सड़क और संसद में जवाब देने की रणनीति
सड़क से संसद तक आक्रामक रणनीति के तहत वरिष्ठ मंत्रियों को मैदान में उतारकर बीजेपी ने राजनीतिक संदेश दिया, वहीं पीओके में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई से तनाव बढ़ा।

बीजेपी के 'लोकतंत्र बचाओ' अभियान और राजनीतिक रणनीतियों पर चर्चा के दौरान नेताओं की सक्रियता।
भारतीय जनता पार्टी के 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' अभियान का अंतिम दिन सियासी टकराव के लिहाज से बेहद अहम रहा। इस अभियान के तहत अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस, हिमंता बिस्व सरमा और अश्विनी वैष्णव जैसे केंद्रीय मंत्री एवं मुख्यमंत्री सड़कों पर उतरे। सवाल यह है कि बीजेपी को देशभर में इस अभियान के जरिए अपनी पूरी राजनीतिक ताकत दिखाने की जरूरत क्यों पड़ी और इसके पीछे राहुल गांधी की सड़क पर उतरकर की गई राजनीति को क्या वजह माना जा रहा है?
दरअसल, राहुल गांधी के सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने और रील्स के जरिए राजनीतिक माहौल बनाने के बाद बीजेपी ने इस स्थिति का राजनीतिक जवाब देने की रणनीति तैयार की। पार्टी ने अपने घरों में बैठे कार्यकर्ताओं को सक्रिय करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि बीजेपी सड़क पर भी राजनीतिक लड़ाई लड़ सकती है और संसद में भी हर सवाल का जवाब देने में सक्षम है। पार्टी ने तय किया कि राहुल गांधी की गतिविधियों पर अब चुप्पी नहीं साधी जाएगी और उन्हें उन्हीं की राजनीतिक शैली में जवाब दिया जाएगा।
इसी बीच राहुल गांधी की राजनीति को लेकर यह दावा किया जा रहा है कि एसआईआर के मुद्दे पर अपेक्षित भावनात्मक जुड़ाव नहीं बन पाने के बाद उन्होंने अपनी पुरानी राजनीतिक रणनीति की ओर रुख किया है। इसके तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को निशाना बनाने का एक और अभियान शुरू किया गया। आरोप है कि राहुल गांधी की राजनीति का केंद्र मोदी पर लगातार आरोप लगाना और उन्हें कमजोर, डरा हुआ, समझौता करने वाला या चोर बताना है। इसकी वजह यह मानी जा रही है कि प्रधानमंत्री मोदी की छवि बीजेपी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है।
बीजेपी का आक्रामक रुख संकेत दे रहा है कि राहुल गांधी की ओर से प्रधानमंत्री मोदी पर किए जाने वाले हमलों का जवाब पार्टी और अधिक आक्रामक तरीके से देगी। अभियान के अंतिम दिन अमित शाह ने भी राहुल गांधी को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सड़कछाप राजनीति की जाएगी तो सड़क पर जवाब मिलेगा और संसद में सवाल उठाए जाएंगे तो वहां भी करारा जवाब दिया जाएगा। बीजेपी के इस रुख के पीछे उसका मजबूत संगठन, बड़ी संख्या में उपलब्ध वरिष्ठ नेता और प्रधानमंत्री मोदी का मार्गदर्शन प्रमुख ताकत के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। दावा किया जा रहा है कि जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना पीओके के लोगों पर ड्रोन से बम बरसा रही है और उनके घरों को रॉकेट लॉन्चर से निशाना बना रही है। निहत्थे नागरिकों पर गोलीबारी किए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। रावलाकोट में पाकिस्तानी रेंजर्स और पुलिस की फायरिंग में 18 लोगों की मौत होने की बात कही गई है, जिनमें चार बच्चे शामिल हैं।
आरोपों के मुताबिक, हालात इतने भयावह हैं कि लोगों को अपनों के शव उठाने तक का मौका नहीं दिया जा रहा है। घायलों को उठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश करने वालों पर भी निशाना साधकर गोलियां चलाई जा रही हैं। पीओके से सामने आ रही तस्वीरों को बेहद भयावह बताया जा रहा है। यहां लोग सड़कों पर उतरकर सस्ता राशन, स्कूलों में बेहतर सुविधाएं और अपने बुनियादी अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
दावा है कि पीओके में पिछले चार महीने से विरोध प्रदर्शन जारी हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान अब तक सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, हजारों लोग जेलों में बंद हैं और सैकड़ों लोगों के लापता होने की बात कही जा रही है। बुनियादी जरूरतों और अधिकारों की मांग कर रहे निहत्थे लोगों पर गोलीबारी को पाकिस्तानी सेना की क्रूर कार्रवाई बताया जा रहा है। आरोप है कि दो वक्त की रोटी मांगने वाले लोगों की जान ली गई, बेहतर शिक्षा की मांग करने वाले छात्रों को गोलियों से छलनी किया गया और महिलाओं को भी मौत के घाट उतार दिया गया।
पीओके में सामने आ रही तस्वीरों और घटनाओं के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि वहां लोगों का असंतोष अब गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई और नागरिकों के विरोध के बीच हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस घटनाक्रम को पाकिस्तान के लिए भविष्य में गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। पीओके के लोगों की मांगों और उनके अधिकारों का सवाल अब पाकिस्तान के कब्जे वाले इस क्षेत्र में जारी विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में आ गया है।

Pratahkal Bureau
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