महंगाई के बीच क्यों BJP ने किया नेहरू पर प्रहार? जानें इतिहास-वर्तमान की तुलना पर छिड़ी नई राजनीतिक जंग
भाजपा ने नेहरू काल के संकटों का हवाला देकर कांग्रेस को घेरा। खाद्य महंगाई और गिरते रुपये के बीच आत्मनिर्भर भारत और नेहरूवादी अर्थव्यवस्था पर छिड़ी नई सियासी जंग।

भाजपा का इन्फोग्राफिक पोस्टर नेहरू काल के खाद्य संकट और वर्तमान आत्मनिर्भरता के अंतर को प्रदर्शित करता हुआ।
BJP criticizes Nehru on food crisis : देश में बढ़ती खाद्य मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच भारतीय राजनीति में एक बार फिर इतिहास और वर्तमान के बीच तुलना का दौर शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की चुनौतियों को आधार बनाकर वर्तमान सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने का एक नया अभियान छेड़ दिया है। भाजपा ने सोशल मीडिया पर 1940 और 1950 के दशक के उन कालखंडों के इन्फोग्राफिक्स साझा किए हैं, जिनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने विभाजन की त्रासदी, भीषण सूखे और अमेरिकी सहायता पर बढ़ती निर्भरता के बीच 'खाद्य' को भारत की सबसे बड़ी चिंता बताया था। इतिहास के इन पन्नों को पलटते हुए भाजपा का लक्ष्य यह स्पष्ट करना है कि एक समय का भारत जहाँ बुनियादी भोजन के लिए संघर्ष कर रहा था, वहीं आज का भारत प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सौर ऊर्जा, आधुनिक कृषि और इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में 'आत्मनिर्भरता' की नई परिभाषा गढ़ रहा है।
हालांकि, भाजपा का यह ऐतिहासिक तुलनात्मक रुख ऐसे समय में सामने आया है जब वर्तमान सरकार स्वयं कठिन आर्थिक मोर्चों पर संघर्ष कर रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश इस समय 4.2 प्रतिशत की खाद्य मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है, जो आम जनता की थाली पर सीधा असर डाल रही है। इसके साथ ही, भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.7 के स्तर के करीब पहुंच गया है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल चुकी हैं। भाजपा इन चुनौतियों को वैश्विक परिस्थितियों और ऐतिहासिक विरासत के संदर्भ में देख रही है, जबकि विपक्षी दल इसे वर्तमान विफलता से ध्यान भटकाने की रणनीति करार दे रहे हैं।
कांग्रेस के आलोचकों ने भाजपा के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। विपक्ष का तर्क है कि एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र, जिसने विभाजन की विभीषिका झेली थी, उसकी तुलना एक दशक से सत्ता में बैठी वर्तमान सरकार के कार्यकाल से करना अनुचित और अतार्किक है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार अपनी विफलताओं और बढ़ती महंगाई को छिपाने के लिए दशकों पुराने इतिहास का सहारा ले रही है। सदन से लेकर सोशल मीडिया तक, विपक्षी खेमा यह सवाल उठा रहा है कि सत्ता में इतने वर्षों के बाद भी वर्तमान समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय पूर्वजों के संघर्षों को नीचा दिखाना कहाँ तक न्यायसंगत है।
Jawaharlal Nehru spent years speaking about food shortages as India’s biggest crisis… and yet, Congress only offered lectures, not solutions.
— BJP (@BJP4India) May 12, 2026
“Skip rice.”
“Miss meals.”
“Tighten belts.”
“Don’t organise feasts.”
And when the crisis deepened?
Blame businessmen.
Blame hoarders.… pic.twitter.com/uD9RnYruvz
इस राजनीतिक घमासान का महत्व केवल जुबानी जंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक दृष्टिकोण पर एक बड़े विमर्श को जन्म देता है। भाजपा का यह 'कथावाचन' (Storytelling) यह संदेश देने की कोशिश है कि भारत ने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है और वर्तमान कठिनाइयां महज अस्थायी वैश्विक उतार-चढ़ाव हैं। वहीं, विपक्षी प्रहार सरकार को जवाबदेही के कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इतिहास का यह सहारा बढ़ती महंगाई और गिरते रुपये के बीच जनता के विश्वास को बनाए रखने में भाजपा के लिए मददगार साबित होता है या विपक्ष इसे 'विभाजनकारी और भटकाने वाली राजनीति' के रूप में स्थापित करने में सफल रहता है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
