बिहार की राजनीति में गठबंधन के दौर और अंतर्विरोधों की एक नई तस्वीर उभरकर सामने आ रही है। हाल ही में महागठबंधन के विधायक और आईआईपी पार्टी के अध्यक्ष इंद्रजीत प्रसाद गुप्ता उर्फ आईपी गुप्ता ने एक बेहद विवादास्पद और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बयान देकर राज्य की सियासी हलचल तेज कर दी है। विधायक गुप्ता का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी उन सवर्ण नेताओं को विशेष रूप से निशाना बना रही है जो जनता दल यूनाइटेड (JDU) और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाते हैं। उनके इस बयान ने न केवल एनडीए के भीतर के समीकरणों पर सवाल उठाए हैं, बल्कि बिहार की पारंपरिक जातीय राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है।

विधायक आईपी गुप्ता ने एक हालिया साक्षात्कार में बेहद आक्रामक तेवर अपनाते हुए कहा कि भूमिहार और राजपूत समुदाय के नेताओं को भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा हाशिए पर धकेला जा रहा है। उन्होंने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेते हुए आगाह किया कि ये नेता किसी खास जाति के सगे नहीं हैं। गुप्ता का तर्क है कि जो भी सवर्ण नेता नीतीश कुमार या उनके पुत्र निशांत कुमार की राजनीतिक मजबूती के लिए खड़ा होता है, भाजपा उसे राजनीतिक रूप से 'सेंक' देती है यानी उसे नुकसान पहुँचाती है।

अपने दावों को पुख्ता करने के लिए आईपी गुप्ता ने पूर्व सांसद अरुण कुमार और कद्दावर नेता आनंद मोहन के उदाहरण पेश किए। उन्होंने कहा कि अरुण कुमार ने एक लंबे अंतराल के बाद जदयू में वापसी की और उनके बेटे ऋतुराज कुमार ने विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की, बावजूद इसके उन्हें सरकार में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इसी तरह आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद का जिक्र करते हुए विधायक ने कहा कि फरवरी 2024 के फ्लोर टेस्ट में नीतीश कुमार का साथ देने के बावजूद उन्हें मंत्री पद से वंचित रखा गया। गुप्ता का आरोप है कि भाजपा ने जानबूझकर इन नेताओं के राजनीतिक कद को बढ़ने से रोका है क्योंकि ये जदयू के प्रति निष्ठावान दिख रहे थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आईपी गुप्ता का यह बयान महज एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि महागठबंधन की सवर्णों को अपने पाले में लाने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। बिहार की राजनीति में लंबे समय तक राजद को 'माई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण तक सीमित माना जाता रहा है, लेकिन हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि राजद अब सवर्ण वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश कर रही है। भोजपुर-बक्सर एमएलसी उपचुनाव में राजपूत उम्मीदवार सोनू कुमार राय पर दांव लगाना और उनकी जीत सुनिश्चित करना इसी बदली हुई रणनीति का संकेत है।

दूसरी ओर, भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। पार्टी का तर्क है कि मंत्रिमंडल का गठन और सांगठनिक निर्णय गठबंधन के आंतरिक समन्वय का हिस्सा होते हैं। हालांकि, जिस तरह से आईपी गुप्ता ने तथ्यों को जातीय रंग देकर पेश किया है, उससे भूमिहार और राजपूत समाज के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। विशेष रूप से 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह की बयानबाजी मतदाताओं के ध्रुवीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

बिहार की राजनीति में जातीय गोलबंदी हमेशा से निर्णायक रही है। आईपी गुप्ता के इस बयान ने भाजपा और जदयू के बीच के आपसी विश्वास पर प्रहार करने की कोशिश की है। यदि सवर्ण मतदाताओं के एक वर्ग में यह संदेश जाता है कि भाजपा उनके नेताओं को दबा रही है, तो इसका सीधा लाभ महागठबंधन को मिल सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भाजपा इस जुबानी हमले का मुकाबला किस तरह करती है और क्या सवर्ण समाज इस नैरेटिव को स्वीकार करता है।


Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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