कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर विधानसभा सीट हमेशा से सत्ता के शक्ति केंद्र के रूप में पहचानी जाती रही है। यह वही निर्वाचन क्षेत्र है जिसने ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्कर्ष को न केवल दिशा दी, बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, भवानीपुर एक बार फिर वैचारिक युद्ध का मैदान बना हुआ है, जहां तृणमूल कांग्रेस अपनी 'परंपरा' को बचाने की कोशिश कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी 'प्रतिष्ठा' की इस लड़ाई में सेंध लगाने के लिए तत्पर दिख रही है। नंदीग्राम के ऐतिहासिक चुनाव परिणामों के बाद, भवानीपुर की गलियों में होने वाली हर चर्चा अब राज्य के भविष्य का संकेत दे रही है।

भवानीपुर की भौगोलिक और सामाजिक संरचना इसे राज्य की अन्य सीटों से विशिष्ट बनाती है। यहां की गलियों में चलते हुए विकास के दावों और धरातल की हकीकत के बीच एक बारीक लकीर साफ देखी जा सकती है। स्थानीय बाजारों और चौराहों पर बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क, रोशनी और सुरक्षा को लेकर संतोष का भाव है। विशेष रूप से महिलाओं के बीच 'लक्ष्मी भंडार' योजना एक बड़े भावनात्मक और आर्थिक संबल के रूप में उभरी है, जिसके तहत मिलने वाली सहायता राशि ने मुख्यमंत्री के प्रति एक मजबूत समर्थन आधार तैयार किया है। कालीघाट मंदिर के निकटवर्ती क्षेत्रों में स्ट्रीट वेंडर्स और छोटे व्यापारियों का मानना है कि वर्तमान प्रशासन ने उनके हितों के साथ कभी समझौता नहीं किया, जो इस क्षेत्र में टीएमसी की पकड़ को मजबूत बनाए रखने का एक मुख्य कारण है।

हालांकि, भवानीपुर का राजनीतिक समीकरण केवल विकास कार्यों तक सीमित नहीं है। यहां की आबादी का मिश्रित स्वरूप किसी भी चुनाव परिणाम को पलटने की क्षमता रखता है। लगभग 40 प्रतिशत बंगाली भाषी हिंदुओं के साथ-साथ इतनी ही संख्या में गैर-बंगाली भाषी समुदायों का होना इस सीट को दिलचस्प बनाता है। बिहार, पंजाब, गुजरात और मारवाड़ी समुदायों की एक बड़ी आबादी यहां के वॉर्ड नंबर 70 और 72 में केंद्रित है। यह वह मतदाता वर्ग है जो शांति और व्यापारिक सुगमता को प्राथमिकता देता है। बीजेपी के बढ़ते चुनावी प्रचार और सक्रियता ने उन मतदाताओं के बीच भी हलचल पैदा कर दी है, जो पारंपरिक रूप से मतदान प्रक्रिया से दूर रहते थे। व्यापारी वर्ग का एक हिस्सा अब बदलाव की भाषा बोल रहा है, जिनका तर्क है कि नंदीग्राम की हार के बाद क्षेत्र की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदली हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र में 'स्वास्थ्य साथी' जैसी योजनाओं के प्रभाव ने भी चुनावी विमर्श को गहराई दी है। स्थानीय निवासियों के अनुभव बताते हैं कि निजी अस्पतालों में मिलने वाले मुफ्त इलाज ने मध्यम और निम्न आय वर्ग के बीच सरकार की छवि को सुधारा है। लेकिन इन सबके बीच 'नंदीग्राम' की छाया भवानीपुर पर साफ दिखाई देती है। विपक्षी दलों का यह तर्क कि मुख्यमंत्री ने एक बार इस सीट को छोड़ा था, मतदाताओं के एक वर्ग के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। 2011 में वामपंथी शासन के अवसान से लेकर 2021 के उपचुनावों तक, भवानीपुर ने हर बार ममता बनर्जी का साथ दिया है, लेकिन 2026 की आहट के बीच अब यहाँ का मतदाता अधिक मुखर और विश्लेषणात्मक हो गया है।

भवानीपुर की यह लड़ाई केवल एक विधानसभा सीट की नहीं, बल्कि राज्य की दो बड़ी राजनीतिक विचारधाराओं के बीच के संतुलन की है। एक तरफ जहां दीदी का घर और उनकी सादगी से जुड़ा भावनात्मक लगाव है, वहीं दूसरी तरफ शहरी मतदाता की बढ़ती आकांक्षाएं और बदलाव की मांग है। इस सीट का परिणाम न केवल यह तय करेगा कि भवानीपुर किसका गढ़ है, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि पश्चिम बंगाल की आगामी राजनीति किस दिशा में मुड़ने वाली है। भवानीपुर की गलियां आज शांत हो सकती हैं, लेकिन उनके भीतर उमड़ता राजनीतिक उफान आने वाले बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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