भारतीय न्याय व्यवस्था में अक्सर यह माना जाता है कि बिना काले कोट और कानून की डिग्री के न्याय की दहलीज पार करना नामुमकिन है। लेकिन हाल के दिनों में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शराब घोटाले से जुड़े मामलों में जिस तरह खुद अदालतों के सामने अपनी दलीलें पेश कीं, उसने एक पुरानी कानूनी परंपरा को जनचर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। जब एक रसूखदार राजनेता वकीलों की फौज होने के बावजूद खुद जज के सामने अपनी बेगुनाही के सबूत रखने लगता है, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत का संविधान और कानून किसी सामान्य व्यक्ति को भी यह शक्ति देता है कि वह बिना किसी मध्यस्थ के अपनी बात सीधे न्यायाधीश तक पहुँचा सके।

भारतीय कानून की शब्दावली में इस अधिकार को 'पार्टी-इन-पर्सन' (Party-in-person) कहा जाता है। यह प्रावधान उस मिथक को तोड़ता है कि केवल वकील ही अदालती कार्यवाही का हिस्सा बन सकते हैं। वास्तव में, भारत की विधिक प्रक्रिया वादी या आरोपी को अपनी बात स्वयं रखने की पूरी स्वायत्तता प्रदान करती है। कानूनी प्रावधानों की गहराई में जाएं तो सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 और पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 दोनों में ही पक्षकारों को स्वयं पेश होने की अनुमति दी गई है। विशेष रूप से 1 जुलाई, 2024 से लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 340 भी इस मौलिक अधिकार को अक्षुण्ण रखती है। यह कानून स्पष्ट करता है कि किसी भी आरोपी को अपनी पसंद के वकील के जरिए बचाव का अधिकार है, लेकिन यह उसे स्वयं अपनी पैरवी करने से वंचित नहीं करता।

इतिहास गवाह है कि भारत में 'पार्टी-इन-पर्सन' का उपयोग केवल मजबूरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और वैचारिक हथियार के रूप में भी किया गया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने चंपारण आंदोलन और नमक सत्याग्रह जैसे ऐतिहासिक मामलों में खुद ही अपनी जिरह की थी। आधुनिक भारत में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी जैसे दिग्गज राजनेताओं ने 2G स्पेक्ट्रम जैसे जटिल मामलों में खुद दलीलें देकर सुप्रीम कोर्ट से बड़े फैसले हासिल किए। पर्यावरणविद् एम. सी. मेहता ने तो ताजमहल के संरक्षण और गंगा प्रदूषण जैसे मसलों पर खुद याचिकाकर्ता बनकर जिरह की और भारत के पर्यावरण कानूनों को एक नई दिशा दी। आज भी सुप्रीम कोर्ट में एक समर्पित 'पार्टी-इन-पर्सन सेल' कार्यरत है, जो उन आम नागरिकों का मार्गदर्शन करता है जो अपनी लड़ाई खुद लड़ने का साहस दिखाते हैं।

हालांकि, यह अधिकार अपने साथ बड़ी जिम्मेदारियां और चुनौतियां भी लेकर आता है। किसी भी व्यक्ति के लिए कोर्ट में खड़ा होकर बोलना मात्र पर्याप्त नहीं है; इसके लिए न्यायालय की पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है। दलीलें केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों और साक्ष्यों (Evidence) पर आधारित होनी चाहिए। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जटिल मामलों में, जहाँ कानून की व्याख्या और दांव-पेच शामिल हों, वहाँ पेशेवर वकील की मदद लेना अधिक सुरक्षित होता है। फिर भी, यदि कोई व्यक्ति अपने केस की बारीकियों को गहराई से समझता है और उसे न्यायपालिका की मर्यादा के भीतर व्यक्त करने की क्षमता रखता है, तो 'पार्टी-इन-पर्सन' उसके लिए एक सशक्त अधिकार है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि न्याय की आवाज किसी तकनीकी बाधा के कारण दबने न पाए और हर नागरिक को अपनी सच्चाई बयां करने का सीधा अवसर मिले।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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