लोकसभा में छिड़ी 'जंग': परिसीमन और जनगणना पर आमने-सामने आए दो दिग्गज, अखिलेश के सवालों पर शाह का करारा जवाब!
संसद के विशेष सत्र में परिसीमन बिल और जातिगत जनगणना को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस, गृहमंत्री ने मुस्लिम आरक्षण को बताया असंवैधानिक।

लोकसभा के विशेष सत्र में परिसीमन विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (बाएं) और सपा प्रमुख अखिलेश यादव (दाएं) के बीच तीखी बहस हुई।
नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में सदन की कार्यवाही अक्सर नीतिगत बहसों और तीखी नोकझोंक की गवाह बनती रही है, लेकिन गुरुवार को लोकसभा के विशेष सत्र में जो दृश्य देखने को मिला, उसने सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की वैचारिक खाई को एक बार फिर गहरे रूप में रेखांकित कर दिया। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा सदन के पटल पर 'परिसीमन बिल, 2026' पेश किए जाने के साथ ही सदन का तापमान एकाएक बढ़ गया। यह विधेयक महिला आरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में पेश किया गया था, परंतु विपक्ष की आपत्तियों ने इसे एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील कर दिया।
जैसे ही बिल पर चर्चा शुरू हुई, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने मोर्चा संभालते हुए सरकार की मंशा पर कड़े सवाल खड़े किए। यादव ने स्पष्ट किया कि यद्यपि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के मूल विचार का समर्थन करती है, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया और जनगणना में हो रही देरी उन्हें स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने सीधे तौर पर सरकार को घेरते हुए पूछा कि आखिर जनगणना का कार्य अब तक क्यों अटका हुआ है। सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी जातिगत जनगणना से बच रही है क्योंकि उसे भय है कि इसके बाद विभिन्न जातियों द्वारा उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण की मांग प्रबल हो जाएगी। उन्होंने इसे सरकार की एक रणनीतिक चाल करार दिया।
अखिलेश यादव के इन प्रहारों का उत्तर देने के लिए स्वयं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मैदान में उतरे। शाह ने सदन को सूचित किया कि जनगणना की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है और सरकार ने जाति आधारित डेटा एकत्र करने का सैद्धांतिक निर्णय ले लिया है। उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि वर्तमान में चल रही घरों की गिनती प्राथमिक चरण है और इसमें किसी प्रकार की जातिगत पहचान का प्रावधान संभव नहीं है। गृहमंत्री ने चुटकी लेते हुए कहा कि विपक्षी दलों की मांगें अब इस स्तर तक पहुंच गई हैं कि वे शायद घरों की भी जाति पूछने की अपेक्षा रखते हैं। शाह ने आश्वासन दिया कि जब व्यक्तिगत नागरिक जनगणना शुरू होगी, तब उसमें जाति का कॉलम निश्चित रूप से शामिल किया जाएगा।
बहस ने तब और अधिक गंभीर मोड़ ले लिया जब आरक्षण के संवैधानिक दायरे पर चर्चा शुरू हुई। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग उठाए जाने पर अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा कि धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का आरक्षण भारतीय संविधान की मूल भावना के विरुद्ध और पूर्णतः असंवैधानिक है। शाह ने तर्क दिया कि हमारा संविधान मजहब के आधार पर विशेष कोटा प्रदान करने की अनुमति नहीं देता। जब अखिलेश यादव ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पूछा कि क्या मुस्लिम महिलाएं देश की आधी आबादी का हिस्सा नहीं हैं, तो शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि यदि समाजवादी पार्टी को इतनी ही चिंता है, तो वह स्वेच्छा से अपने सभी टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे सकती है, जिस पर सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी।
सत्र के अंत तक यह स्पष्ट हो गया कि परिसीमन और जनगणना का मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति का केंद्र बना रहेगा। जहां सरकार इसे एक प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के रूप में देख रही है, वहीं विपक्ष इसे सामाजिक न्याय और जातिगत समीकरणों के तराजू पर तौल रहा है। इस उच्च-स्तरीय बहस ने यह भी सिद्ध कर दिया कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर आज भी देश के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति का अभाव है। सदन की यह कार्यवाही न केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का प्रदर्शन थी, बल्कि इसने भविष्य के चुनावी एजेंडे की एक धुंधली तस्वीर भी पेश कर दी है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
