महिला आरक्षण पर सियासी घमासान: अखिलेश ने उठाया मुस्लिम-पिछड़ा कोटा मुद्दा, संसद में हंगामा
सपा प्रमुख ने जनगणना और परिसीमन के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए विधेयक में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की अपील की।

लोकसभा के विशेष सत्र में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव (दाएं) और सांसद डिंपल यादव (बाएं) महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान।
महिला आरक्षण बिल पर छिड़ी वैचारिक जंग: अखिलेश यादव ने मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व पर उठाए गंभीर सवाल
भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद भवन में जब महिला आरक्षण संशोधन विधेयक की मेज पर रखा गया, तो देश की राजनीति में एक नई बहस का आगाज़ हो गया। लोकसभा के विशेष सत्र के दौरान पेश किए गए इन तीन अहम विधेयकों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेदों की लकीर को और गहरा कर दिया है। जहाँ एक ओर सरकार इसे महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बता रही है, वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इसे एक अधूरा प्रयास करार देते हुए इसमें 'कोटे के भीतर कोटे' की मांग को प्रमुखता से उठाया है। अखिलेश यादव का तर्क सीधा और स्पष्ट है कि यदि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला तक नहीं पहुँचता, तो यह केवल प्रतीकात्मक सुधार बनकर रह जाएगा।
संसद की कार्यवाही के दौरान अखिलेश यादव ने अपने संबोधन में सरकार की मंशा पर सीधे प्रहार किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाजवादी पार्टी सैद्धांतिक रूप से महिला आरक्षण की समर्थक है, लेकिन सरकार जिस जल्दबाजी में इसे लागू करना चाहती है, वह संदेहास्पद है। सपा प्रमुख ने मांग की कि सरकार को सबसे पहले देश में जाति आधारित जनगणना करानी चाहिए। उनका आरोप है कि सरकार जनगणना से इसलिए बच रही है क्योंकि उसे पता है कि सटीक आंकड़े सामने आने के बाद पिछड़े और शोषित वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में हक देना पड़ेगा। अखिलेश यादव ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि क्या मुस्लिम महिलाएं इस देश की आधी आबादी का हिस्सा नहीं हैं? उनके अनुसार, जब तक इस विधेयक में मुस्लिम और पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान नहीं किए जाते, तब तक यह बिल सामाजिक न्याय की अवधारणा को पूरा नहीं करेगा।
सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी इस मुद्दे पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने सरकार पर संविधान की मूल भावना के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया। धर्मेंद्र यादव ने कश्मीर और असम के उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह से वहां के संवैधानिक ढांचे में बदलाव किए गए, वैसी ही कोशिश अब पूरे देश में महिला बिल के नाम पर की जा रही है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वर्तमान संशोधनों को वापस लेकर 2023 में पास किए गए मूल महिला बिल को लागू किया जाए। समाजवादी पार्टी का दावा है कि वह महिलाओं की सबसे बड़ी हितैषी है और वर्तमान में संसद में उनके पास सबसे अधिक महिला सांसद हैं, जो उनकी समावेशी राजनीति का प्रमाण है।
तकनीकी और कानूनी पहलुओं की बात करें तो नए संशोधन विधेयक में भविष्य की एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई है। इसके तहत लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को वर्तमान के 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने का प्रस्ताव है। इस नई व्यवस्था में राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें निर्धारित की जा सकती हैं। सीटों के इस नए आवंटन के लिए परिसीमन की प्रक्रिया को अनिवार्य बनाया गया है। यदि यह विधेयक पारित होकर कानून का रूप लेता है, तो लोकसभा की कुल सीटों में से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। यह व्यवस्था वर्ष 2029 के चुनावों से प्रभावी होने की उम्मीद है।
संसद में जारी इस गतिरोध का अंत फिलहाल निकट नहीं दिख रहा है। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी ने साफ कर दिया है कि वे पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के हक की बलि चढ़ाकर इस बिल का समर्थन नहीं करेंगे। यह राजनीतिक रस्साकशी केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनाव की वैचारिक बिसात भी है। जहां भाजपा इसे अपनी ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी इसे सामाजिक न्याय के तराजू पर तौलकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार विपक्ष की इन मांगों पर कोई बीच का रास्ता निकालती है या फिर यह विधेयक राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक और बड़ा कारण बनता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
