त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय: भारत में सहकारिता आंदोलन का नया युग
गुजरात के आनंद में स्थापित त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (TSU) भारत के सहकारी आंदोलन को नई दिशा देगा। यह देश का पहला राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय है, जो शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से सहकारी संस्थाओं में प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करेगा और ग्रामीण विकास को सशक्त बनाएगा।

भारत में सहकारिता आंदोलन ने दशकों से ग्रामीण विकास, सामाजिक समरसता और आर्थिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस क्षेत्र की अपार संभावनाओं को संस्थागत रूप देने और सहकारी शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान को नए आयाम प्रदान करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने गुजरात के आनंद में त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (TSU) की स्थापना की है। यह देश का पहला राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय है, जो भारतीय सहकारी क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर नई पहचान देगा। विश्वविद्यालय का नाम ‘अमूल’ के संस्थापक त्रिभुवन किशीभाई पटेल के सम्मान में रखा गया है, जिन्होंने भारतीय दुग्ध सहकारिता आंदोलन को विश्वस्तरीय पहचान दिलाई थी।
त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक, 2025 को 3 फरवरी 2025 को लोकसभा में पेश किया गया और 26 मार्च 2025 को पारित किया गया। इसके बाद 1 अप्रैल 2025 को राज्यसभा से भी यह विधेयक पारित हुआ। इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय की स्थापना IRMA के परिसर में की गई है और यह सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत संस्था होगी।
सहकारी संस्थाएं लाभ-केन्द्रित कॉर्पोरेशनों से अलग होती हैं। ये एक संकरित संगठन होती हैं, जिनका उद्देश्य दोहरा होता है—एक ओर वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और दूसरी ओर सदस्यों के सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना। इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस (ICA) के अनुसार, एक सहकारी संस्था स्वायत्त संगठन होती है, जिसमें लोग साझा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लोकतांत्रिक नियंत्रण और साझा स्वामित्व वाली संस्था का निर्माण करते हैं। अमूल जैसी संस्थाएं इसका जीवंत उदाहरण हैं, जहाँ उत्पादकों को उनकी हिस्सेदारी के अनुसार लाभ वितरित किया जाता है।
सहकारी संस्थाएं केवल आर्थिक रूप से सशक्त नहीं बनातीं, बल्कि समाज में समानता, समावेशन और लोकतांत्रिक भागीदारी को भी बढ़ावा देती हैं। छोटे और सीमांत किसान अकेले आर्थिक या तकनीकी संसाधन जुटाने में असमर्थ होते हैं, लेकिन सहकारी समितियों में शामिल होने से उनकी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ती है, जोखिम कम होता है और बाजार व तकनीक तक उनकी पहुंच सुनिश्चित होती है।
भारत में सहकारी क्षेत्र के लिए एक विश्वविद्यालय की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। स्वतंत्रता से पहले से ही कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में सहकारी समितियां स्थापित हो रही थीं। आज देश में 8 लाख से अधिक सहकारी समितियां सक्रिय हैं, जिनसे लगभग 30 करोड़ सदस्य जुड़े हुए हैं। चीनी, दूध, उर्वरक, कृषि ऋण, मत्स्य पालन और महिला कल्याण जैसे क्षेत्रों में सहकारी समितियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के अनुसार, देश की लगभग एक-तिहाई चीनी उत्पादन, एक-चौथाई उर्वरक उत्पादन और एक-दसवां दूध का उत्पादन सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है।
त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय का उद्देश्य सहकारी क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधनों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना है। विश्वविद्यालय में सालाना लगभग 8 लाख लोगों को प्रमाणित किया जाएगा। ई-लर्निंग और डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से देश के दूरदराज़ इलाकों में रहने वाले युवाओं और सहकारी कार्यकर्ताओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जाएगी। विश्वविद्यालय अनुसंधान, नवाचार, नीति निर्माण और प्रशिक्षण के माध्यम से सहकारी संस्थाओं की दक्षता और उत्तरदायित्व को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
विश्वविद्यालय सेक्टर-विशिष्ट स्कूल और प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित करेगा, जैसे गुजरात में डेयरी सहकारिता, केरल में मत्स्य सहकारिता, महाराष्ट्र में सहकारी वित्त और उत्तर प्रदेश-बिहार में महिला सहकारिता। इसके साथ ही यह थिंक टैंक की भूमिका निभाते हुए सहकारी शासन, वित्तीय प्रबंधन और डिजिटल दक्षता के क्षेत्रों में नीति सुझाव भी देगा। भविष्य में विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे ICA, ILO और FAO के साथ साझेदारी कर भारत को वैश्विक सहकारी नेतृत्व की दिशा में अग्रसर करेगा।
त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि सहकारी आंदोलन का ज्ञान, नवाचार और नेतृत्व का केंद्र बनेगा। यह संस्थान न केवल कर्मचारियों और सदस्यों की क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि भारत को सहकारिता आधारित विकास का वैश्विक आदर्श बनाने में भी योगदान देगा।
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Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
