असफल प्रेम कहानी के कारण पुलिस भर्ती पर संकट में फंसे युवक को सुप्रीम कोर्ट से राहत, एक फैसले ने बचा लिया करियर
सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना पुलिस भर्ती मामले में कहा कि असफल प्रेम संबंध या शादी न होने की स्थिति में किसी पक्ष को धोखेबाज या चरित्रहीन नहीं माना जा सकता।

नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट भवन, जहां जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने अहम फैसला सुनाया।
देश की बदलती सामाजिक व्यवस्था और आधुनिक जीवनशैली के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने सामाजिक मानदंडों को पुनर्परिभाषित करने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है। एक ऐतिहासिक फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दो अविवाहित बालिगों के बीच आपसी सहमति से स्थापित किए गए शारीरिक संबंधों को 'नैतिक अधमता' या सदाचार का पतन नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि समाज में तेजी से आ रहे बदलावों के बीच ऐसे संबंधों का चलन आम हो रहा है, इसलिए इसे किसी भी व्यक्ति के चरित्र पर लांछन लगाने या उसके बारे में कोई नकारात्मक निष्कर्ष निकालने का विधिक आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। देश की शीर्ष अदालत का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के दायरे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
यह ऐतिहासिक कानूनी व्यवस्था जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने एक विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए दी। मामला एक ऐसे युवा उम्मीदवार से जुड़ा था जिसने तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, परंतु बोर्ड ने उसके चरित्र सत्यापन के दौरान एक पुराने आपराधिक मामले का हवाला देकर उसकी नियुक्ति को पूरी तरह निरस्त कर दिया था। पुलिस भर्ती बोर्ड की इस दंडात्मक कार्रवाई की जड़ें उम्मीदवार के एक पुराने और असफल हो चुके प्रेम संबंध से जुड़ी थीं। पीड़ित उम्मीदवार और शिकायतकर्ता युवती दोनों पड़ोसी थे और लगभग चार वर्षों तक एक-दूसरे के साथ गहरे भावनात्मक और शारीरिक संबंध में थे। संबंध टूटने के बाद उत्पन्न कानूनी विवाद के कारण उम्मीदवार की सरकारी नौकरी पर संकट आ गया था, जिसे शीर्ष अदालत ने अनुचित ठहराया है।
सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस मामले की संवेदनशीलता और इसके सामाजिक प्रभावों को रेखांकित करते हुए कहा कि मानवीय जीवन में हर एक रिश्ता अंततः विवाह के मुकाम तक ही पहुंचे, ऐसा होना कतई अनिवार्य नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल इस एकमात्र कारण से किसी भी दीर्घकालिक संबंध को गलत या अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि वह रिश्ता कानूनी तौर पर शादी में तब्दील नहीं हो पाया। जस्टिस मनमोहन ने फैसले का वाचन करते हुए कहा कि देश का ऐसा कोई भी कानून मौजूद नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को उनकी अपनी स्वतंत्र इच्छा और आपसी सहमति से एक-दूसरे के साथ संबंध रखने से रोकता हो। अतः रिश्ता टूटने की स्थिति में किसी भी एक पक्ष को कानूनी तौर पर धोखेबाज़ या अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने पुलिस भर्ती बोर्ड के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि जब तक किसी व्यक्ति पर लगे आरोपों को सक्षम न्यायालय के समक्ष पूर्ण रूप से साबित नहीं कर दिया जाता, तब तक कानून की नजर में उस व्यक्ति को पूरी तरह निर्दोष माना जाएगा। इस मामले में दोनों पक्षों के बीच पुराना संबंध था और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट है कि वे कई वर्षों से एक-दूसरे से भली-भांति परिचित थे। ऐसी स्थिति में कानून वैध सहमति की धारणा को स्वीकार करता है। एम्प्लॉयर यानी नियोक्ता संस्थाएं महज अतीत के किसी विवाद के आधार पर अपने स्तर पर कोई दंडात्मक या नकारात्मक निष्कर्ष नहीं निकाल सकती हैं।
शीर्ष अदालत ने इस निर्णय के माध्यम से शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के मामलों में होने वाले कानूनी समझौतों पर भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि यदि इस प्रकार के आपराधिक मामलों में लोक अदालत के समक्ष दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता संपन्न होता है, तो इसका अर्थ यह कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि आरोपी ने अपने ऊपर लगे अपराध को स्वीकार कर लिया है। नियोक्ता संस्थाएं केवल इस आधार पर किसी उम्मीदवार को अयोग्य नहीं ठहरा सकतीं कि उसका कोई आपराधिक मामला आपसी समझौते के साथ समाप्त हुआ था। जब तक इस बात का कोई पुख्ता विधिक साक्ष्य न हो कि शिकायतकर्ता पक्ष पर समझौता करने के लिए कोई अनुचित बल प्रयोग, धमकी या दबाव डाला गया था, तब तक उम्मीदवार को रोजगार के अधिकार से वंचित करना पूरी तरह गैर-कानूनी और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना जाएगा।

Lalita Rajput
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