भारत में सहकारी क्षेत्र की भूमिका ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ की तरह मानी जाती है। देश में लगभग 8.5 लाख सहकारी समितियाँ सक्रिय हैं, जिनके 29 करोड़ सदस्य विभिन्न क्षेत्रों जैसे डेयरी, मत्स्य पालन, कृषि, उपभोक्ता, औद्योगिक और बहुउद्देश्यीय सहकारिता में संलग्न हैं। इन संस्थाओं के सदस्यों के लिए सतत विकास और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कौशल विकास अब अनिवार्य माना जा रहा है।

सहकारी संस्थाएँ न केवल व्यावसायिक इकाइयाँ हैं, बल्कि वे अपने सदस्यों की सुरक्षा और निवेश पर मूल्यवर्द्धन का माध्यम भी हैं। यह द्विपक्षीय उद्देश्य उन्हें पूंजीवाद और समाजवाद के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित करता है। वैश्विक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सहकारी संस्थाओं ने स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को संरक्षित रखते हुए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा की है। इसके लिए आवश्यक है कि सदस्यों में उद्यमशीलता, नेतृत्व, प्रबंधकीय और तकनीकी कौशल विकसित किए जाएँ।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहकारी आंदोलन की शक्ति को ICA (International Cooperative Alliance) और ILO (International Labour Organization) ने मान्यता दी है। वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, दुनिया की 12% आबादी लगभग 30 लाख सहकारी समितियों से जुड़ी है, जो 280 मिलियन लोगों को रोजगार देती हैं। ILO ने सहकारी संस्थाओं में शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास को सामाजिक समावेशन, गरीबी उन्मूलन और हरित रोजगार के लिए आवश्यक बताया है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर Our.coop जैसे प्रशिक्षण पैकेज और COPAC जैसे बहु-हितधारक सहयोगी प्रयास सक्रिय हैं।

भारत में भी कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। राष्ट्रीय कौशल विकास नीति (2009), राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता नीति (2015) और राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन (NSDM, 2015) जैसी पहलें कुशल कार्यबल तैयार करने और रोजगार वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए कार्यरत हैं। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY), स्किल इंडिया मिशन, राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS) जैसी योजनाओं के माध्यम से युवाओं और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कौशल को सशक्त किया जा रहा है।

इसी क्रम में भारत सरकार ने 3 फरवरी 2025 को लोकसभा में “त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक, 2025” पेश किया। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य IRMA, आनंद को राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय में परिवर्तित कर सहकारी क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण को एक सशक्त संरचना प्रदान करना है। यह पहल भारत में सहकारी क्षेत्र के लिए समर्पित पहला विशेष विश्वविद्यालय है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सहकारी संस्थाओं के पेशेवर प्रबंधन को सुदृढ़ करने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

IRMA की स्थापना 1979 में श्वेत क्रांति और ग्रामीण विकास के लिए प्रशिक्षित प्रबंधकों को तैयार करने हेतु हुई थी। अब प्रस्तावित विश्वविद्यालय सहकारी शिक्षा के लिए गुणवत्ता मानक स्थापित करने, सहकारी नेतृत्व और नवाचार को बढ़ावा देने तथा डिजिटल परिवर्तन के माध्यम से सहकारी संस्थाओं को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने का कार्य करेगा। यह विश्वविद्यालय छात्रों और पेशेवरों को उद्योग 4.0/5.0 और आधुनिक प्रबंधन तकनीकों से लैस करने का अवसर भी प्रदान करेगा।

भारत में सहकारी क्षेत्र की यह नई पहल न केवल कौशल विकास के क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व रखती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन और सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में भी मील का पत्थर साबित हो सकती है। पेशेवर और तकनीकी कौशलों के सही संयोजन के माध्यम से सहकारी संस्थाएँ आत्मनिर्भर बनेंगी और सदस्यों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। यह कदम देश में समावेशी और सतत विकास के मार्ग को और भी मजबूती प्रदान करेगा।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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