दीपावली पर भगवान गणेश और मां लक्ष्मी को भोग लगाने के लिए पुरवा की पारंपरिक त्रिलोकपरी मिठाई का विशेष महत्व है। शक्कर और सफेद तिल से तैयार होने वाली यह पतली और खुश्क मिठाई अपनी अलग पहचान के चलते स्थानीय बाजार से लेकर विदेशों तक मशहूर है। त्योहार नजदीक आते ही इसकी मांग बढ़ जाती है और दुकानों पर कारीगर इसे तैयार करने में जुट जाते हैं।

संवाद सहयोगी, पुरवा (उन्नाव)। दीपावली पर भगवान गणेश और मां लक्ष्मी को लईया, चूरा, खील, शक्कर के गट्टे, खिलौने और त्रिलोकपरी का भोग लगाने की पुरानी परंपरा है। उन्नाव के पुरवा कस्बे में शक्कर और तिल्ली से बनने वाली त्रिलोकपरी का विशेष महत्व है। अपनी पारंपरिक विधि और अनूठे स्वाद के कारण पहचान बनाने वाली इस मिठाई की मांग दीपावली के दौरान काफी बढ़ जाती है।

कार्तिक मास में दीपावली के लिए शक्कर से बनी मिठाइयों की बिक्री दशहरा के बाद ही शुरू हो जाती है। पुरवा कस्बे की आधा दर्जन से अधिक दुकानों पर कारीगर त्रिलोकपरी तैयार करने में दिन-रात जुटे रहते हैं। इसे खरीदने के लिए आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग मुख्य बाजार पहुंचते हैं। कस्बे की कई दुकानों पर यह मिठाई पांच पीढ़ियों से बनाई जा रही है। स्थानीय लोगों में खिलौने और शक्कर के गट्टों की तुलना में त्रिलोकपरी अधिक पसंद की जाती है।

अब पुरवा की त्रिलोकपरी की मांग बड़े शहरों के साथ विदेशी बाजारों में भी पहुंच गई है। लोग इसे दूसरे शहरों और विदेशों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के लिए यहां से मंगवाते हैं। अन्य जगहों की तुलना में इसकी बिक्री दस गुना अधिक बताई जाती है।

राजा बाजार निवासी दुकानदार छोटेलाल आर्य के मुताबिक, उनके परिवार में चार पीढ़ियों से त्रिलोकपरी बनाने की परंपरा चली आ रही है। इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले शक्कर की चाशनी को फेंटा जाता है। इसके बाद उसकी लोई बनाकर उसमें सफेद तिल लपेटे जाते हैं और बेलन से पतला बेला जाता है। दूसरी जगहों पर लोई को पाटे से दबाकर मिठाई तैयार की जाती है, जिससे उसकी मोटाई अधिक रहती है। इसके विपरीत पुरवा की त्रिलोकपरी पतली और खुश्क होती है। यही इसकी अलग पहचान और स्वाद का प्रमुख कारण है।

छोटेलाल आर्य ने बताया कि लोग इस मिठाई को अपने रिश्तेदारों के यहां भी भेजते हैं। पहले के समय में लोग इसे ही मिठाई के रूप में घर लेकर जाते थे। आज भी इसके खास स्वाद के कारण घरों में इसकी मांग बनी हुई है।

कस्टोलवा निवासी दुर्गेश गुप्ता ने बताया कि उनके परिवार में पीढ़ियों से पुरवा की त्रिलोकपरी आती रही है। उनके परिवार में मां लक्ष्मी को इसी मिठाई का भोग लगाया जाता है। वहीं, इसी मोहल्ले के दीपक मिश्रा ने बताया कि वह कई वर्षों से कस्बे में त्रिलोकपरी बनते देख रहे हैं। दीपावली पर वह यह मिठाई विदेश में रहने वाले अपने भाई को भेजते हैं।

दुर्गेश गुप्ता के अनुसार, पुरवा में बनने वाली त्रिलोकपरी उनके परिवार की पीढ़ियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है और वे इसी मिठाई से मां लक्ष्मी को भोग लगाते हैं। दीपक मिश्रा का कहना है कि कस्बे में कई वर्षों से बन रही इस मिठाई की मिठास के आगे दूसरी मिठाइयां फीकी लगती हैं। इसी वजह से वह हर दीपावली पर इसे विदेश में रहने वाले अपने भाई के पास भेजते हैं।

शक्कर और तिल से बनने वाली पुरवा की त्रिलोकपरी केवल दीपावली की मिठाई नहीं, बल्कि कस्बे की पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक पहचान भी है। इसकी खास बनावट, स्वाद और विदेशों तक पहुंचती मांग ने इसे त्योहार की खास मिठाइयों में अलग स्थान दिलाया है।

Pratahkal Newsroom

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