यह कविता समाज में चरित्र, आरोप, मौन और सत्य के बीच के द्वंद्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। कवि स्वयं को कलंकित मानते हुए भी उन लोगों के छिपे हुए चेहरों और वास्तविकताओं को पहचानने का दावा करता है जो स्वयं को चरित्रवान प्रदर्शित करते हैं। रचना में आत्मस्वीकृति, व्यंग्य, चेतावनी और समय की प्रतीक्षा का भाव समाहित है। कवि का मौन उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि संयम और परिस्थितियों की गहरी समझ का प्रतीक बनकर उभरता है।

*कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं, मेरा मौन रहना चरित्रवानों के लिए बेहतर है*

कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं,

इसलिए हर आरोप का उत्तर नहीं देता,

हर पत्थर का हिसाब नहीं रखता,

हर छल का प्रतिशोध नहीं लेता,

कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं,

मेरा मौन रहना चरित्रवानों के लिए बेहतर हैं।

मेरे दामन पर दाग हैं, यह मैं मानता हूं,

पर जिनके वस्त्र उजले दिखते हैं,

उनके भीतर के अंधेरे भी पहचानता हूँ,

कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं,

मेरा मौन रहना चरित्रवानों के लिए बेहतर है।

मुझे बदनाम करने वालों की फेहरिस्त लंबी है,

पर मेरे पास भी कुछ सच हैं,

जिनकी उम्र उनकी शोहरत से लंबी है।

कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं,

मेरा मौन रहना चरित्रवानों के लिए बेहतर है।

मैं बोलूं तो कई मुखौटे गिर जाएंगे,

कई सम्मानित चेहरे अपने ही शब्दों से कटघरे में खड़े नजर आएंगे,

कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं,

मेरा मौन रहना चरित्रवानों के लिए बेहतर है।

मगर मेरी खामोशी को कमजोरी मत समझना,

तूफान आने से पहले का सन्नाटा हूँ मैं,

मुझे सिर्फ वक्त की भाषा समझना,

कलंकित चरित्रों से लिप्त इंसान हूँ मैं,

मेरा मौन रहना चरित्रवानों के लिए बेहतर है।

लेखक: किरोड़ी लाल मीना

Pratahkal Bureau

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