जानें क्या है International Philosophy Olympiad प्रतियोगिता ? जिसने वैश्विक मंच पर भारत को दिलाया कांस्य
यूनेस्को आयोजित अंतरराष्ट्रीय दर्शनशास्त्र ओलंपियाड में निबंध लेखन के कड़े पैमानों और बहुस्तरीय मूल्यांकन प्रणाली से विजेताओं का चुनाव होता है। रिपोर्ट में जानें इस प्रतियोगिता के पीछे का मुख्या उद्देश्य क्या है।

यूनेस्को और एफआईएसपी के संरक्षण में स्कूली छात्रों के लिए प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय दर्शनशास्त्र ओलंपियाड का आधिकारिक लोगो और परिचयात्मक ग्राफिक।
International Philosophy Olympiad 2026 : वैश्विक मंच पर जब बुद्धि और तर्क का महासंग्राम छिड़ता है, तो इतिहास केवल उन्हीं का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करता है जिनके पास विचारों की अचूक धार और विवेक की गहराई होती है। पोलैंड की ऐतिहासिक राजधानी वारसॉ में आयोजित प्रतिष्ठित 34वें अंतर्राष्ट्रीय दर्शनशास्त्र ओलंपियाड (आईपीओ 2026) में भारत की एक ऐसी ही मेधावी संतान ने वैश्विक बौद्धिक पटल पर देश का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है। महाराष्ट्र के अकोला जिले के सत्रह वर्षीय छात्र सार्थक कमलकिशोर ढोले ने ५७ देशों के एक सौ चौबीस सबसे प्रखर युवा विचारकों को कड़ी टक्कर देते हुए देश के लिए कांस्य पदक जीता है। सार्थक की यह गौरवमयी जीत न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा का प्रमाण है, बल्कि इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के पिछले सात वर्षों के पदक के सूखे को भी हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है। तो चलो अब जानते है की क्या है यह अंतर्राष्ट्रीय दर्शनशास्त्र ओलंपियाड ( International Philosophy Olympiad ).
जब पूरी दुनिया परमाणु हथियारों, भौगोलिक सीमाओं और राजनीतिक वर्चस्व की जंग में उलझी हो, तब क्या चंद युवा मस्तिष्कों के विचार और शब्द वैश्विक व्यवस्था को एक नई दिशा दे सकते हैं? इस हैरान कर देने वाले सवाल का जीवंत और सनसनीखेज जवाब हर साल 'अंतरराष्ट्रीय दर्शनशास्त्र ओलंपियाड' (IPO) के मंच पर देखने को मिलता है। यह महज स्कूली बच्चों की कोई आम प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि दुनिया भर के मेधावी छात्रों का एक ऐसा वैचारिक और बौद्धिक महाकुंभ है, जहां चार घंटे की कड़े पहरे वाली खामोशी में इंसानियत, विज्ञान और नैतिकता के सबसे बड़े संकटों का हल खोजा जाता है। यूनेस्को (UNESCO) के सीधे सहयोग और इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फिलॉसॉफिकल सोसाइटीज (FISP) के कड़े संरक्षण में आयोजित होने वाली यह सालाना जंग आज दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित खोजी और तार्किक प्रतियोगिता बन चुकी है, जो आने वाली पीढ़ी को बंदूक के बजाय विचारों से दुनिया बदलने का हुनर सिखा रही है।
इस वैश्विक बौद्धिक क्रांति की शुरुआत की कहानी किसी राजनीतिक थ्रिलर से कम नहीं है। साल 1947 से 1990 के बीच समूचे पूर्वी यूरोप के स्कूलों में थोपी गई कम्युनिस्ट (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) विचारधारा की बंदिशों को तोड़कर युवा सोच को आजाद करने के लिए बुल्गारिया की सोफिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इवान कोलेव ने एक अभूतपूर्व गुप्त योजना तैयार की थी। इसी छटपटाहट के नतीजे के रूप में साल 1993 में बुल्गारिया के स्मोल्यान शहर में पहली बार इस ऐतिहासिक ओलंपियाड की नींव रखी गई, जिसमें शुरुआत में केवल बुल्गारिया, रोमानिया और तुर्की जैसे तीन देशों ने अपनी खोई हुई वैचारिक आजादी को वापस पाने के लिए हिस्सा लिया था। इसके बाद पोलैंड, जर्मनी और हंगरी जैसे देशों के जुड़ने से यह कारवां बढ़ता गया और साल 2009 तक इसमें भाग लेने वाले देशों की संख्या चालीस के पार पहुंच गई। साल 2020 में कोरोना महामारी के भीषण दौर में जब दुनिया थम गई थी, तब भी स्लोवेनिया ने हार नहीं मानी और इसे डिजिटल रूप (e-IPO) देकर इंटरनेट की दुनिया पर इस दिमागी जंग को जिंदा रखा। हाल के वर्षों में पुर्तगाल, ग्रीस और फिनलैंड की धरती पर टकराने के बाद, साल 2025 में इटली के ऐतिहासिक बारी शहर में 'सहजीविता' (Conviviality) के केंद्रीय विषय पर इस महाकुंभ का सबसे भव्य और ऐतिहासिक संस्करण संपन्न हुआ है।
इस ओलंपियाड के नियम और मूल्यांकन के कड़े मापदंड इतने सख्त हैं कि यहां जरा सी भी चूक सीधे प्रतियोगिता से बाहर का रास्ता दिखा देती है। परीक्षा कक्ष में दाखिल होते ही छात्रों के सामने चार बेहद पेचीदा दार्शनिक विषय (कथन) रखे जाते हैं, जिन पर उन्हें बिना किसी बाहरी मदद के लगातार चार घंटे तक एक मुकम्मल दार्शनिक निबंध लिखना होता है। इस परीक्षा का सबसे हैरतअंगेज और कठिन नियम यह है कि कोई भी छात्र अपनी मातृभाषा में निबंध नहीं लिख सकता। यदि किसी छात्र की मूल भाषा अंग्रेजी या फ्रेंच है, तो उसे अनिवार्य रूप से जर्मन या स्पेनिश जैसी किसी दूसरी विदेशी भाषा में ही अपनी सोच को शब्दों का रूप देना होगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस परीक्षा में सफलता की कसौटी तय करने के लिए पांच बेहद कड़े पैमाने निर्धारित किए गए हैं, जो इस प्रकार हैं:
- विषय की अचूक प्रासंगिकता : छात्र का लेखन दिए गए दार्शनिक विषय से भटके बिना सीधे मुद्दे पर होना चाहिए।
- दार्शनिक समझ की गहराई : चुने गए विषय के अंतर्निहित दार्शनिक सिद्धांतों और इतिहास की बारीकी से समझ।
- तार्किक निरंतरता और प्रवाह (कोहेरेंस) : निबंध का हर पैराग्राफ और विचार आपस में एक मजबूत कड़ी की तरह जुड़ा होना चाहिए।
- तर्कों की अचूक शक्ति : अपनी बात को सही साबित करने के लिए दिए गए अकादमिक और व्यावहारिक तर्कों का वजन।
- वैचारिक मौलिकता (ओरिजिनलिटी) : घिसे-पिटे विचारों से अलग छात्र की अपनी खुद की नई और अनूठी सोच।
इस परीक्षा की कॉपियों को जांचने की प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था इतनी पारदर्शी है कि इसमें किसी भी प्रकार के पक्षपात की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाती है। मूल्यांकन की प्रक्रिया को मुख्य रूप से तीन बेहद जटिल चरणों में विभाजित किया गया है:
- प्रथम चरण (अंतरराष्ट्रीय जूरी) : विभिन्न देशों के शिक्षकों का 4 से 5 सदस्यों का एक अज्ञात समूह बनाया जाता है। प्रत्येक शिक्षक 5 से 6 निबंधों को गंभीरता से पढ़ता है और 10 अंकों के पैमाने पर अपनी रेटिंग देता है। जिस निबंध को औसतन 7.0 या उससे अधिक अंक मिलते हैं, वही अगले दौर में पहुंचता है। सख्त नियम के मुताबिक, कोई भी शिक्षक अपने देश के छात्र की कॉपी को छू तक नहीं सकता।
- द्वितीय चरण (गहन समीक्षा) : इस चरण में अंतरराष्ट्रीय जूरी के चार नए सदस्य उन चुनिंदा निबंधों की दोबारा व्यक्तिगत रूप से जांच करते हैं, जिनका स्कोर पिछले दौर में 7.0 से ऊपर था या जिनके अंकों में दो जूरी सदस्यों के बीच 3.0 से अधिक अंकों का भारी अंतर पाया गया था।
- अंतिम चरण (संचालन मंडल का फैसला) : अंत में, एफआईएसपी और अंतरराष्ट्रीय समिति के पांच शीर्ष सदस्यों का सर्वोच्च संचालन मंडल (स्टीयरिंग बोर्ड) हर एक शॉर्टलिस्ट किए गए निबंध को खुद पढ़ता है। यह बोर्ड जूरी की रैंकिंग को बदलने का पूरा कानूनी अधिकार रखता है और यही सर्वोच्च मंडल स्वर्ण, रजत, कांस्य पदक और 'ऑनरेबल मेंशन' (सराहनीय प्रविष्टि) विजेताओं के नामों पर अंतिम मुहर लगाता है।
इस अंतरराष्ट्रीय युद्ध के मैदान में उतरने के लिए हर देश को अपने यहां एक कठिन राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इटली में इसके लिए बाकायदा शिक्षा मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त 'कैम्पियोनाटी डी फिलोसोफिया' नामक एक बेहद कड़ा राष्ट्रीय स्तर का मुकाबला होता है, जहां स्कूलों से लेकर क्षेत्रीय स्तर की ऑनलाइन परीक्षाओं को पास करने के बाद ही शीर्ष दो छात्रों को अंग्रेजी भाषा में मुकाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच का टिकट मिलता है। वहीं एस्टोनिया जैसे देश में तो छात्रों को घर पर निबंध लिखने के बाद चार दिनों के कड़े शिविर, अनौपचारिक तर्कशास्त्र की परीक्षाओं और आमने-सामने की लाइव मौखिक बहस के दौर से गुजरना पड़ता है। भारत की कहानी भी इस मामले में बेहद सनसनीखेज और उतार-चढ़ाव भरी रही है; सरकारी फंड की भारी कमी और अंदरूनी सांगठनिक खींचतान के कारण साल 2008 में भारत का इस प्रतियोगिता से नाता पूरी तरह टूट गया था। लेकिन बाद में 'अभिनव फिलॉसॉफर' नामक एक अनूठी ऑनलाइन चयन परीक्षा के जरिए इसे दोबारा पुनर्जीवित किया गया, जहां देश भर के शीर्ष 20% तार्किक छात्रों को चुनकर उन्हें रोजाना 12 घंटे की बेहद थका देने वाली और कड़ी दार्शनिक ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे वैश्विक मंच पर तिरंगे का मान बढ़ा सकें।
अंतरराष्ट्रीय दर्शनशास्त्र ओलंपियाड का यह सफरनामा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि दुनिया को बदलने और शांति स्थापित करने के लिए हथियारों की नहीं, बल्कि तीखे तर्कों और गहरी नैतिक सोच की जरूरत होती है। शीतयुद्ध के मलबे से निकलकर आज इक्कीसवीं सदी के डिजिटल दौर तक पहुंच चुका यह ओलंपियाड सिर्फ मेधावी बच्चों को मेडल देने का जरिया नहीं है, बल्कि यह भविष्य के उन विश्व नेताओं और नीति-निर्माताओं को तैयार करने की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है, जो आने वाले समय में नफरत के दौर में भी तार्किकता और सहजीविता का रास्ता अख्तियार करेंगे। जब तक युवा मस्तिष्कों में इस तरह स्वतंत्र और नैतिक रूप से सोचने की मशाल जलती रहेगी, तब तक वैश्विक शांति और मानवीय चेतना का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित हाथों में है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
