करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस? पूर्व CJI चंद्रचूड़ के एक बयान ने सुलगाई सनातन और संविधान की नई जंग|
मुंबई के वकील ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश को नोटिस भेजकर सनातन धर्म की भावनाएं आहत करने का लगाया आरोप, बिना शर्त मांगी माफी।

मासिक धर्म और पूजा-अर्चना के पारंपरिक नियमों पर दिए गए सार्वजनिक बयान के बाद कानूनी विवादों में घिरे भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़।
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियां अक्सर कानूनी और सामाजिक विमर्श की दिशा तय करती हैं, लेकिन कई बार यही बयान बड़े विवादों का कारण भी बन जाते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज सूर्यकांत अपने एक बयान को लेकर चर्चा के केंद्र में रहे थे। अब इसी कड़ी में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डॉ. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ भी अपनी एक हालिया सार्वजनिक टिप्पणी के चलते वैधानिक मुश्किलों में घिर गए हैं। इस पूरे विवाद की जड़ में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ को मासिक धर्म और पूजा-अर्चना संबंधी पारंपरिक नियमों पर दिए गए एक बयान के कारण भेजा गया कानूनी नोटिस है। मुंबई के एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा भेजे गए इस नोटिस में स्पष्ट रूप से आरोप लगाया गया है कि पूर्व सीजेआई के वक्तव्य से सनातन धर्म और उससे जुड़ी करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं गंभीर रूप से आहत हुई हैं।
इस पूरे कानूनी प्रकरण की पृष्ठभूमि को समझें तो यह मामला बीते 28 मई को आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम से जुड़ा है। इस मंच से देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने अपने पारिवारिक जीवन का एक बेहद निजी प्रसंग साझा किया था। उन्होंने अपनी पुत्रवधू के साथ हुए एक संवाद का उल्लेख करते हुए सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मासिक धर्म (Periods) जैसी प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया किसी भी महिला को अशुद्ध नहीं बनाती है। उन्होंने आगे यह भी जोड़ दिया था कि महिलाएं इस अवधि के दौरान भी बिना किसी झिझक या रूढ़िवादिता के भगवान की पूजा-अर्चना में पूरी तरह से भाग ले सकती हैं। पूर्व सीजेआई के इसी प्रगतिशील माने जाने वाले विचार पर मुंबई के वकील घनश्याम उपाध्याय ने कड़ा कानूनी ऐतराज जताया है। उपाध्याय का तर्क है कि इस बयान के जरिए सनातन धर्म की स्थापित मान्यताओं का अनादर हुआ है। इसी के चलते उन्होंने पूर्व न्यायाधीश को नोटिस भेजकर सार्वजनिक स्पष्टीकरण और बिना शर्त माफी मांगने की मांग की है।
अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय द्वारा भेजे गए इस नोटिस में पूर्व मुख्य न्यायाधीश पर कई गंभीर वैधानिक और धार्मिक आरोप मढ़े गए हैं। कानूनी नोटिस के मुताबिक, पूर्व सीजेआई ने अपने अत्यंत निजी और पारिवारिक अनुभव को एक सार्वजनिक और आधिकारिक गरिमा वाले मंच पर इस प्रकार से प्रस्तुत किया, जिसने सनातन धर्म की सदियों पुरानी पारंपरिक मान्यताओं, शास्त्रों के दिशा-निर्देशों और धार्मिक प्रथाओं को सीधे तौर पर चुनौती देने का काम किया है। नोटिस में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि मासिक धर्म के दौरान कुछ विशिष्ट धार्मिक प्रतिबंधों का निष्ठापूर्वक पालन करना कई हिंदू संप्रदायों और परंपराओं में स्थापित धार्मिक अभ्यास का एक अनिवार्य हिस्सा है। हिंदू समाज इसे कभी भी किसी सामाजिक भेदभाव, कुप्रथा या महिलाओं के अपमान के रूप में नहीं देखता, बल्कि यह शुचिता के नियमों से जुड़ा है।
इस कानूनी नोटिस का सबसे पेचीदा और गंभीर पहलू वह है, जिसमें देश की न्यायपालिका के सामने लंबित बड़े मामलों का उल्लेख किया गया है। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चले और वर्तमान में भी कतिपय संदर्भों में लंबित प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद का संदर्भ दिया गया है। सबरीमाला मामले में महिलाओं के प्रवेश, जैविक चक्र और धार्मिक परंपराओं को लेकर एक लंबी संवैधानिक व न्यायिक बहस देश में पहले से ही चल रही है। नोटिस भेजने वाले वकील ने पूर्व सीजेआई से सीधा सवाल पूछा है कि वे इस प्रकार का सार्वजनिक बयान देकर क्या किसी लंबित धार्मिक विवाद या न्यायिक कार्यवाही को परोक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास कर रहे थे। एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश का ऐसा बयान समाज में भ्रम पैदा कर सकता है।
यह पूरा मामला अब देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के बीच एक बड़े संवैधानिक विवाद के रूप में तब्दील होता दिख रहा है। गौरतलब है कि न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ अपने कार्यकाल के दौरान कई अदालती फैसलों में महिलाओं के अधिकारों और मासिक धर्म से जुड़ी रूढ़ियों के खिलाफ खड़े रहे हैं। उनके नेतृत्व वाली पीठ ने ही मासिक धर्म के स्वास्थ्य, स्वच्छता और इस दौरान मिलने वाली सहूलियतों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले 'जीवन के अधिकार' का एक अभिन्न हिस्सा माना था। ऐसे में यह विवाद अब केवल एक पूर्व न्यायाधीश की व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के नागरिकों को मिलने वाले दो मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन साधने का एक बड़ा वैधानिक प्रश्न बन चुका है।
चूंकि मामले में आमने-सामने खड़े दोनों ही पक्ष कानून और न्याय के क्षेत्र की गहरी समझ रखते हैं, इसलिए इस नोटिस के बाद की कूटनीतिक हलचल पर सबकी निगाहें टिकी हैं। स्थापित कानूनी नियमों के अनुसार, किसी भी विधिक नोटिस का जवाब एक निश्चित समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य होता है। यदि तय समय के भीतर पूर्व मुख्य न्यायाधीश की तरफ से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आता है, तो यह पूरी तरह से नोटिस भेजने वाले अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह इस मामले को देश की किसी सक्षम अदालत में आपराधिक या दीवानी याचिका के रूप में ले जाना चाहते हैं या नहीं। बहरहाल, यदि पूर्व सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या ठोस जवाब आता है, तो यह मसला न केवल कानूनी गलियारों की बहस बनेगा, बल्कि देश के संवैधानिक मूल्यों, धार्मिक आस्थाओं और सामाजिक सुधार की सीमाओं पर एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का आधार भी तैयार करेगा।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
