किसी भी गगनचुंबी इमारत की भव्यता उसके शिखर से तय होती है, लेकिन उसका अस्तित्व उसकी नींव के पत्थर पर टिका होता है । नींव का वह पत्थर भले ही बाहर से दिखाई न दे, पर पूरी इमारत का भार वही उठाता है । यदि नींव को कमजोर कर दिया जाए, तो आलीशान से आलीशान ढांचा भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है ।

ठीक यही स्थिति किसी भी कॉर्पोरेट या व्यापारिक संस्थान की होती है। किसी भी संस्था के पुराने और अनुभवी कर्मचारी उसकी नींव के पत्थर होते हैं । उन्होंने संस्था के निर्माण का कठिन दौर देखा होता है, शुरुआती चुनौतियों से लोहा लिया होता है और अपने खून-पसीने से उसे एक वटवृक्ष बनाया होता है । आज के इस आधुनिक युग में नए कर्मचारी चंद महीनों में तकनीकी काम तो सीख सकते हैं, लेकिन वर्षों के अनुभव से मिलने वाली परिपक्वता, निष्ठा और प्रबंधन की कला कुछ दिनों में हासिल नहीं की जा सकती ।

आज के समय में निजी कंपनियों और व्यापारिक संस्थानों में छंटनी की खबरें लगातार सुनने को मिल रही हैं। कभी लागत कम करने के नाम पर, कभी मुनाफा बढ़ाने के नाम पर और कभी नई तकनीक अपनाने के नाम पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा है। चिंता की बात यह है कि इस प्रक्रिया में कई बार सबसे पहले उन कर्मचारियों पर गाज गिरती है जिन्होंने वर्षों तक संस्था की सेवा की होती है। किसी भी संगठन की वास्तविक सफलता केवल उसकी आलीशान इमारतों, महंगी मशीनों या एआई (AI) सॉफ्टवेयर से नहीं होती, बल्कि उन इंसानों की धड़कनों और मेहनत से होती है जो दिन-रात उसे आगे बढ़ाते हैं । ऐसे में जब पुराने कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकाल दिया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की नौकरी जाने का मामला नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य पर संकट खड़ा हो जाता है।

अनुभव का कोई विकल्प नहीं

अनुभव किसी बंद कमरे में बैठकर या किताबों के पन्ने पलटकर नहीं आता; यह वर्षों के कठिन परिश्रम, असफलताओं और विपरीत परिस्थितियों से जूझकर प्राप्त होता है । एक अनुभवी कर्मचारी जिस जटिल समस्या का समाधान चुटकियों में कर देता है, वहीं नए रंगरूट घंटों उलझे रहते हैं । इसलिए, समझदार मैनेजमेंट पुराने कर्मचारियों को 'लागत' (Liability) नहीं, बल्कि संस्था की सबसे मूल्यवान 'संपत्ति' (Asset) के रूप में देखता है ।

सपनों की अर्थी और मानसिक आघात

जब कोई कर्मचारी किसी संस्थान को अपने जीवन के 10, 15 या 20 साल देता है, तो वह केवल मासिक वेतन की उम्मीद नहीं रखता, बल्कि उस नौकरी के भरोसे अपने जीवन के सबसे बड़े सपने बुनता है । वह होम लोन लेता है, बच्चों को अच्छे स्कूलों में दाखिल कराता है, बूढ़े माता-पिता के इलाज की व्यवस्था करता है और उसी शहर को अपना आशियाना मान लेता है।

एक काल्पनिक नहीं, बल्कि आज के समाज का वास्तविक उदाहरण देखिए—एक व्यक्ति जिसने 15 साल पूरी निष्ठा से काम किया । नौकरी की स्थिरता को देखकर उसने 30 लाख का होम लोन लिया, बच्चों का भविष्य प्लान किया । लेकिन अचानक एक सुबह उसे एक ईमेल मिलता है कि "अब आपकी सेवाएं समाप्त की जाती हैं" ।

इस एक वाक्य से उस व्यक्ति के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। अब उसके सामने यक्ष प्रश्न खड़े होते हैं—बैंक की किस्तें कैसे चूकेंगी? बच्चों की स्कूल फीस कहाँ से आएगी? बुजुर्गों की दवाइयाँ कैसे मिलेंगी? नौकरी जाने का यह दर्द सिर्फ आर्थिक नहीं होता, यह एक गहरा मानसिक आघात होता है । यह व्यक्ति को अवसाद (Depression), गंभीर चिंता (Anxiety) और आत्म-विश्वास के शून्य हो जाने के कगार पर धकेल देता है ।

क्या केवल मुनाफा ही एकमात्र पैमाना है?

व्यापार या संस्था चलाने का अधिकार और लाभ कमाने की इच्छा जायज है । लेकिन क्या नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का कोई मोल नहीं है? यदि कोई कंपनी या संस्थान अपने कठिन समय में कर्मचारियों से अतिरिक्त काम और सहयोग की अपेक्षा करता है, तो अच्छे और मुनाफे के समय में उन्हीं कर्मचारियों को सुरक्षा, स्थायित्व और सम्मान देना मैनेजमेंट का पहला कर्तव्य होना चाहिए । कर्मचारियों को कोई 'मशीन का पुर्जा' नहीं समझा जा सकता जिसे जरूरत पड़ने पर चालू किया और अनुपयोगी होने पर कबाड़ में फेंक दिया । वे भी भावनाओं, जिम्मेदारियों और सपनों से बने इंसान हैं ।

कुछ वास्तविक उदाहरण हमें सोचने पर मजबूर करते हैं

पिछले कुछ वर्षों में देश और दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने हजारों कर्मचारियों की छंटनी की है। इनमें ऐसे कर्मचारी भी शामिल थे जिन्होंने वर्षों तक कंपनी की सेवा की थी। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी कहानी साझा की कि सुबह तक वे कंपनी के महत्वपूर्ण कर्मचारी थे और शाम तक बेरोजगार हो गए।यह स्थिति केवल आईटी सेक्टर तक सीमित नहीं है। उत्पादन, शिक्षा, सेवा और अन्य निजी क्षेत्रों में भी समय-समय पर ऐसा देखने को मिलता है।

संस्थाओं को क्या करना चाहिए?

यदि किसी कारणवश कर्मचारियों की संख्या कम करना आवश्यक हो, तो संस्थाओं को कुछ जिम्मेदार कदम उठाने चाहिए—

• छंटनी को अंतिम विकल्प बनाया जाए।

• कर्मचारियों को पर्याप्त पूर्व सूचना दी जाए।

• उचित मुआवजा और आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।

• कर्मचारियों के लिए पुनः प्रशिक्षण (Reskilling) की व्यवस्था की जाए।

• अन्य विभागों या परियोजनाओं में समायोजन की संभावनाएं तलाश की जाएं।

• लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों के अनुभव और योगदान का सम्मान किया जाए।

ऐसे कदम न केवल कर्मचारियों का विश्वास बनाए रखते हैं बल्कि संस्था की सामाजिक छवि को भी मजबूत बनाते हैं।

कर्मचारियों के लिए आत्ममंथन: वक्त के साथ बदलना अनिवार्य

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि इस तेजी से बदलती दुनिया में केवल संस्थाओं को दोष देकर काम नहीं चलेगा । कर्मचारियों को भी आत्ममंथन करना होगा और अपनी योग्यता को लगातार निखारना होगा । आज तकनीक की रफ्तार बुलेट ट्रेन जैसी है —नए सॉफ्टवेयर, नई कार्यप्रणालियां और एआई (AI) हर रोज काम के तरीकों को बदल रहे हैं ।

यदि कोई यह सोचे कि वह वर्षों पुराने ढर्रे पर काम करता रहेगा और नई चीजें सीखने से परहेज करेगा, तो वह अनजाने में अपने लिए संकट को बुलावा दे रहा है । इसलिए, हर कामकाजी व्यक्ति को नियमित रूप से अपनी स्किल्स को अपग्रेड करना चाहिए ।

रोजगार जगत की यह शाश्वत कहावत आज के समय में सबसे ज्यादा सटीक बैठती है—

"जो वक्त के साथ खुद को नहीं बदलता, वक्त उसे इतिहास के पन्नों में बदल देता है।"


लेखक:-

  • राकेश जैन, असिस्टेंट प्रोफेसर, गीताजंली कॉलेज, उदयपुर
  • डॉ. हेमेन्द्र पंवार,असिस्टेंट प्रोफेसर, गीताजंली कॉलेज, उदयपुर

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