आज का आधुनिक समाज जहाँ एक ओर चांद और मंगल पर कदम रख रहा है, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी कुप्रथाओं की बेड़ियों में आज भी जकड़ा हुआ है। स्त्री सशक्तिकरण और बेटी बचाओ के बुलंद नारों के बीच, दहेज जैसी सामाजिक बुराई आज भी हमारे भीतर के खोखलेपन को उजागर करती है। इसी कड़वी सच्चाई और बेटियों के दर्द को बयां करती हुई अन्नू राठौड़ "रुद्रांजली" की यह मर्मस्पर्शी कविता, सीधे हमारे समाज की चेतना और उस तथाकथित 'चार लोगों' की दोहरी मानसिकता पर कड़ा प्रहार करती है। यह कविता मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि हर उस मजबूर पिता और कफ़न में लिपटी बेटी की चीख है जो इस समाज से एक बुनियादी सवाल पूछ रही है। आइए, इस संवेदनशील रचना के जरिए समाज के इस स्याह पहलू को समझने और बदलने का संकल्प लें।

...कब होगा परिवर्तन


नव रीति प्रचलित हुई पाणी ग्रहण के नाम,

पहले पूछते गोत्र योग्यता फिर दहेज का दाम,

बेटी के बाबुल से पूछे कितना दम है भाई ,

वरना दहलीज से उठे हम रखो बेटी बिन ब्याही,

जन्म हुआ तो कहते हैं लक्ष्मी है घर आई, अधिकारों की बात हो तो कहते बेटी तो होती पराई।

गाय बचे तो पुण्य मिले बेटी जले तो उसका भाग्य,

बोलो कैसा दोहरा धर्म है , आखिर कैसा यह समाज।

किसी ने घुट घुट कर खुद को फंदे पर लटकाया,

लालची हाथ से यह गला घोटते ,कैसा जोड़ा है बनाया।

किसी को मारा पीटा तुमने, फिर छत से है फेंक गिराया।

लालच की आग में तुमने आज, फिर किसी को जिंदा जलाया।

अरे !क्यों चौंकते हैं सुनकर आप बात नहीं यह सदियों पुरानी ,

पिछले महीने की घटनाएं सारी ,क्या ट्विशा ,दीपिका अनू, पलक या रानी ।

अरे बेटी होना जैसे पाप हुआ, और विवाह कोई अभिशाप ।

पढ़ाओ, लिखाओ ,बचाओ और ब्याहो फिर अंत में करो विलाप।

स्वयं को पुरुष कहते सीना चौड़ा कर दंभ दिखाएं,

किंतु उनके पुरुष तो दहेज में ही बिक जाए ।

गाड़ी मांगे ,पैसा मांगे ,जो लड़के बिकते हैं फिक्स्ड रेट।

क्यों ब्याहा तुमने उससे क्यों चढ़ाई मेरी भेंट।

जिन हाथों से नोट गिने, उसी से भरते हो मांग।

कहा मानवता बची है तुम में ,तुमने लालच की दी हर सीमा लांघ।

जिसकी बेटी ही नहीं, घर की रौनक तक तुम ले आते हो ।

आखिर उस पिता को किस मुंह से फरमान इतने सुनते हो।

मां बाबा बिटिया जलेगी आपके द्वार ,भाई देगा कंधा भरसक,

जिस समाज की दुहाई देते थे आप ,देखिए आज वह खड़ा है बनकर मुख दर्शक।

बिन ब्याही और तलाकशुदा खुश बेटियां जिनसे देखी नहीं जाती,

देखिए ना कहां गए वो चार लोग ,देखिए ना कहां गए वो आलोचक।

मां बाबा इतना ना बेटियों को करो पराई ,की वापसी हो जाए उनकी मुश्किल।

सुनो समझो उनके दर्द को ऐसे ना छोड़ो मरने को तिल तिल।

बस बहुत हुआ यह मौन बहुत हुआ अत्याचार,

ना मरेगी ट्विशा कोई ना दीपिका इस बार।

जब दहेज लेना- देना दोनों जुर्म है।

जो मांगे वह जेल चले, जो दे वो भी गुनहगार।

सुन लो बेटियों के बाबुल सुन लो बेटों के पिता आज,

दहेज मुक्त विवाह से ही सुधरेगा परिवार और समाज।

कफन में लिपटी बिटिया पूछे ,करती है आप सबसे निवेदन।

न्याय मिलेगा हमें कब आखिर कब होगा यह परिवर्तन?


-: अन्नू राठौड़ "रुद्रांजली"

रुद्रांजली जी की यह पंक्तियाँ हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि जब कानूनन दहेज लेना और देना दोनों अपराध है, तो फिर क्यों आज भी शादियों में बेटों के 'फिक्स्ड रेट' तय किए जाते हैं। जब तक हम बेटियों को पराया धन मानकर उनके आत्मसम्मान से समझौता करते रहेंगे और समाज के डर से चुप रहेंगे, तब तक यह दर्दनाक सिलसिला थमेगा नहीं। असली परिवर्तन तभी आएगा जब हर माता-पिता अपनी बेटियों को इतना सशक्त बनाएंगे कि उन्हें किसी लालची दहलीज की जरूरत न पड़े और हर युवा बिना किसी लालच के, स्वाभिमान के साथ विवाह के बंधन को स्वीकार करे। आइए, इस कविता के मूल संदेश को आत्मसात करें और एक दहेज-मुक्त, सुरक्षित और संवेदनशील समाज के निर्माण में अपना योगदान दें, ताकि भविष्य में फिर किसी ट्विशा या दीपिका को अपनी जान न गंवानी पड़े।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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