एआई के दौर में आस्था पर बढ़ता संकट: जब तकनीक बन रही है भ्रम और धार्मिक दुष्प्रचार का माध्यम
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच धार्मिक आस्था से जुड़े फर्जी वीडियो और तस्वीरें नई चुनौती बनकर उभरे हैं। जानिए कैसे एआई-जनरेटेड कंटेंट समाज, विश्वास और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर रहा है।

आधुनिक दौर में एआई तकनीक के जरिए निर्मित भ्रामक धार्मिक सामग्री और डीपफेक वीडियो समाज में भ्रांतियां फैला रहे हैं। यह तस्वीर केवल उदाहरणात्मक उद्देश्य के लिए एआई द्वारा निर्मित है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने आधुनिक दुनिया में अभूतपूर्व बदलाव लाए हैं। चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसी तकनीक का एक चिंताजनक पहलू भी तेजी से सामने आ रहा है। धार्मिक आस्था और विश्वास से जुड़े मामलों में एआई के दुरुपयोग ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जहां फर्जी तस्वीरें, वीडियो और डीपफेक सामग्री लोगों की भावनाओं को प्रभावित करने का माध्यम बन रही हैं।
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एआई से निर्मित धार्मिक सामग्री की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। देवी-देवताओं, धार्मिक स्थलों और आध्यात्मिक हस्तियों को ऐसे रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिनका वास्तविक घटनाओं या परंपराओं से कोई संबंध नहीं होता। कई वीडियो और तस्वीरों में धार्मिक प्रतीकों को जीवंत दिखाकर लोगों को यह संदेश दिया जाता है कि यदि वे उस सामग्री को लाइक, शेयर या फॉरवर्ड नहीं करेंगे तो उन्हें दुर्भाग्य का सामना करना पड़ेगा। विशेषज्ञ इसे केवल भ्रामक सामग्री नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था के मनोवैज्ञानिक शोषण का उदाहरण मानते हैं।
हाल ही में पुरी के जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा एक एआई-जनरेटेड वीडियो व्यापक रूप से वायरल हुआ, जिसमें भगवान जगन्नाथ पर क्रेन के माध्यम से दूध चढ़ाते हुए दिखाया गया था। बाद में मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई धार्मिक अनुष्ठान कभी आयोजित नहीं हुआ और वीडियो पूरी तरह फर्जी था। इसी प्रकार उज्जैन के महाकाल मंदिर से संबंधित एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी, जिसमें एक व्यक्ति को गर्भगृह के भीतर बैठा दिखाया गया। जबकि मंदिर की व्यवस्था के अनुसार वहां केवल अधिकृत पुजारियों को ही प्रवेश की अनुमति है। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि एआई तकनीक के जरिए तैयार की गई सामग्री को पहचानना आम लोगों के लिए कितना कठिन होता जा रहा है।
यह चुनौती केवल किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। सिख समुदाय ने भी स्वर्ण मंदिर से जुड़े कथित एआई-निर्मित वीडियो को लेकर चिंता व्यक्त की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं। इजरायल में सोशल मीडिया पर एक एआई-निर्मित ‘रब्बी’ लंबे समय तक धार्मिक संदेश प्रसारित करता रहा, जिसे हजारों लोगों ने वास्तविक धार्मिक व्यक्तित्व समझा। बाद में यह सामने आया कि उसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं था। इस घटना ने डिजिटल युग में सूचना और विश्वास की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ा खतरा तब उत्पन्न होता है, जब एआई का उपयोग धार्मिक भावनाओं को भड़काने या सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च से जुड़ी फर्जी तस्वीरें और वीडियो कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। ऐसी सामग्री न केवल लोगों को भ्रमित करती है, बल्कि सामाजिक अविश्वास और सांप्रदायिक तनाव को भी बढ़ाने की क्षमता रखती है।
राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी यह स्थिति गंभीर मानी जा रही है। धार्मिक प्रतीकों और भावनाओं को प्रभावित करने के लिए एआई का उपयोग अब केवल तकनीकी शरारत का विषय नहीं रह गया है। इसके माध्यम से जनमत को प्रभावित करने, सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाने और लोगों की भावनाओं को दिशा देने की आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं। जब तकनीक और आस्था का मिश्रण भ्रम पैदा करता है, तो उसका प्रभाव केवल डिजिटल मंचों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की वास्तविक शांति और एकता को भी प्रभावित कर सकता है।
इस बढ़ते खतरे को देखते हुए न्यायपालिका और विभिन्न संस्थाएं भी सक्रिय हुई हैं। अदालतों ने एआई-जनरेटेड डीपफेक और भ्रामक सामग्री के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि वे ऐसी सामग्री की पहचान कर उसे समय रहते हटाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि लोग सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर सामग्री को बिना सत्यापन के सच न मान लें।
धार्मिक आस्था और तकनीकी प्रगति के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती सत्य और भ्रम के बीच अंतर बनाए रखने की है। एआई मानव विकास का एक महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन इसका दुरुपयोग सामाजिक विश्वास और धार्मिक संवेदनाओं के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ऐसे में तकनीक के जिम्मेदार उपयोग, जागरूकता और सतर्कता के माध्यम से ही इस चुनौती का प्रभावी समाधान संभव है। यदि समय रहते इस दिशा में आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में सत्य और असत्य के बीच की रेखा और अधिक धुंधली हो सकती है, जिसका असर सामाजिक एकता और धार्मिक विश्वास दोनों पर पड़ सकता है।

Pratahkal Bureau
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