भारतीय सड़कों पर सुलभ यात्रा का नया सवेरा: 2026 से केवल 'लो-फ्लोर' बसों का होगा निर्माण
भारत में सार्वजनिक परिवहन की सूरत बदलेगी! 2026 से सभी नई सिटी बसों के लिए 'लो-फ्लोर' होना अनिवार्य। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए सुगम होगा सफर। केंद्र सरकार के इस नए सुरक्षा और एक्सेसिबिलिटी नियम के प्रभाव, समयसीमा और निर्माण मानकों की पूरी जानकारी के लिए पढ़ें यह विशेष रिपोर्ट।

नई दिल्ली: भारत सरकार ने देश के सार्वजनिक परिवहन तंत्र को अधिक सुलभ, सुरक्षित और आधुनिक बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक युगांतरकारी निर्णय लिया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नए आदेश के अनुसार, वर्ष 2026 के उत्तरार्ध से भारत में निर्मित होने वाली सभी नई सिटी बसों के लिए 'लो-फ्लोर' (कम ऊंचाई वाला फर्श) होना अनिवार्य कर दिया गया है। यह नीतिगत बदलाव न केवल शहरी गतिशीलता को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि देश के लाखों दिव्यांगजनों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए यात्रा के संघर्ष को सदैव के लिए समाप्त कर देगा।
सुगमता और सुरक्षा: एक नया मानक
वर्तमान में, अधिकांश भारतीय शहरों में ऊंचे पायदानों वाली बसें प्रचलित हैं, जो शारीरिक रूप से अक्षम और वृद्ध नागरिकों के लिए एक बड़ी बाधा साबित होती हैं। सरकार का यह नया सुरक्षा और सुगमता नियम (Accessibility Rule) वैश्विक मानकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
- प्रवेश और निकास में सुगमता: लो-फ्लोर बसों की ऊंचाई सड़क की सतह से न्यूनतम होती है, जिससे यात्री बिना किसी मशक्कत के बस में चढ़ और उतर सकते हैं।
- यात्रा के समय में बचत: यात्रियों के त्वरित चढ़ाव और उतार के कारण बस स्टॉप पर लगने वाला समय (Dwell Time) कम होगा, जिससे बसों की परिचालन दक्षता में वृद्धि होगी।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल: लो-फ्लोर बसें अपने डिजाइन के कारण अधिक स्थिर होती हैं, जिससे शहरी यातायात के दौरान इनके पलटने या असंतुलित होने का खतरा कम हो जाता है।
नीतिगत ढांचा और समयसीमा
सरकार द्वारा निर्धारित गाइडलाइंस के अनुसार, यह नियम इंट्रा-सिटी (शहर के भीतर चलने वाली) बसों पर लागू होगा। मंत्रालय ने ऑटोमोबाइल निर्माताओं को स्पष्ट संकेत दिए हैं कि 2026 के अंत तक अपनी असेंबली लाइनों को इन नए मानकों के अनुरूप ढाल लें।
नियम के मुख्य प्रावधान:
- व्हीलचेयर एक्सेसिबिलिटी: नई बसों में रैंप और व्हीलचेयर के लिए समर्पित स्थान होना अनिवार्य होगा।
- मानकीकरण: सभी बस बॉडी निर्माताओं को 'अर्बन बस स्पेसिफिकेशन' (UBS) के तहत नए प्रमाणपत्र प्राप्त करने होंगे।
- कानूनी प्रवर्तन: देर 2026 के बाद निर्मित कोई भी गैर-लो-फ्लोर बस शहर परिवहन के लिए पंजीकृत नहीं की जा सकेगी।
प्रशासनिक और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय 'सुगम्य भारत अभियान' (Accessible India Campaign) की दिशा में सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। अधिकारियों का कहना है कि शहरीकरण के बढ़ते दबाव के बीच, एक समावेशी परिवहन प्रणाली समय की मांग है। इस नियम के लागू होने से न केवल आम जनता को आराम मिलेगा, बल्कि यह निजी वाहनों पर निर्भरता कम करके सार्वजनिक परिवहन के उपयोग को प्रोत्साहित करेगा।
विकसित भारत की सुलभ राह
बस निर्माण नीति में यह बदलाव केवल एक तकनीकी संशोधन नहीं है, बल्कि यह एक संवेदनशील और प्रगतिशील समाज के निर्माण का प्रतिबिंब है। 2026 से शुरू होने वाला यह सफर भारत के शहरी परिदृश्य को बदल कर रख देगा। जब देश की बसें बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक का स्वागत करेंगी, तभी 'समान अवसर' का संवैधानिक स्वप्न धरातल पर उतरेगा। यह कदम निश्चित रूप से भारत को उन विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करेगा जहाँ सार्वजनिक सुविधाएं नागरिक की गरिमा को सर्वोपरि रखती हैं।

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