नई दिल्ली: भारतीय इतिहास के पन्नों में 24 फरवरी 1739 की तारीख एक ऐसे काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल दिल्ली के वैभव को मिट्टी में मिला दिया, बल्कि एक विशाल साम्राज्य के पतन की पटकथा भी लिख दी। हरियाणा के करनाल के मैदानों में लड़ा गया यह युद्ध केवल दो राजाओं की महत्वाकांक्षाओं का टकराव नहीं था, बल्कि यह आधुनिक सैन्य रणनीति और पुरातन युद्ध शैली के बीच का वह अंतर था जिसने भारत को आने वाली सदियों के लिए कमजोर कर दिया। ईरान के नेपोलियन कहे जाने वाले नादिर शाह और मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के बीच हुआ यह भीषण संग्राम भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक मानचित्र को हमेशा के लिए बदलने वाला साबित हुआ।

इस महायुद्ध की पृष्ठभूमि नादिर शाह की बढ़ती साम्राज्यवादी भूख और मुगल दरबार की आंतरिक कलह से तैयार हुई थी। नादिर शाह ने मुगलों पर अफगान विद्रोहियों को शरण देने और राजदूतों के अपमान का आरोप लगाते हुए सीमा पार की थी, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि उसका वास्तविक लक्ष्य दिल्ली के मयूर सिंहासन और खजाने में दबी बेहिसाब दौलत थी। मुगल सेना संख्या बल में नादिर की फौज से कहीं बड़ी थी; जहाँ एक ओर दो लाख से अधिक मुगल सैनिक हाथियों और भारी तोपों के साथ मैदान में थे, वहीं नादिर शाह के पास मात्र पचास हजार मगर अत्यधिक अनुशासित और आधुनिक हथियारों से लैस घुड़सवार थे।

युद्ध का घटनाक्रम रणनीतिक कुशलता और नेतृत्व की विफलता का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है। मुगल सेनापतियों—निजाम-उल-मुल्क, सआदत खान और खान-ए-दौरान—के बीच आपसी ईर्ष्या और तालमेल की कमी ने नादिर शाह का काम आसान कर दिया। जब सआदत खान ने बिना किसी ठोस योजना के आवेश में आकर हमला किया, तो नादिर शाह की जम्बूरक तोपों (ऊंटों पर टिकी छोटी तोपें) और लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली बंदूकों ने मुगल सेना में तबाही मचा दी। मुगलों के भारी-भरकम हाथी आधुनिक सैन्य गतिशीलता के सामने असहाय सिद्ध हुए और मात्र तीन घंटों के भीतर ही मुगल सेना के पांव उखड़ गए।

इस पराजय के बाद के परिणाम अत्यंत भयावह और ऐतिहासिक रहे। विजय के उन्माद में नादिर शाह ने दिल्ली में प्रवेश किया और वह 'कत्ल-ए-आम' मचाया जिससे यमुना का पानी रक्तवर्ण हो गया। इस लूट में भारत ने न केवल हजारों नागरिकों को खोया, बल्कि विश्व प्रसिद्ध 'तख्त-ए-ताऊस' (मयूर सिंहासन) और कोहिनूर हीरा भी हमेशा के लिए विदेशी हाथों में चला गया। आर्थिक रूप से खोखले हो चुके मुगल साम्राज्य की कमजोरी पूरी दुनिया के सामने उजागर हो गई, जिसने भविष्य में ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी यूरोपीय शक्तियों के लिए भारत पर कब्जा करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। करनाल का युद्ध आज भी हमें याद दिलाता है कि आपसी फूट और आधुनिकता की अनदेखी किस प्रकार एक महान राष्ट्र को पराधीनता की ओर धकेल सकती है।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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