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आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में तेरापंथ स्थापना दिवस समारोह आयोजित
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आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) सानिध्य में सोमवार को तेरापंथ स्थापना दिवस (Terapanth Foundation Day) का समारोह आयोजित हुआ। आरम्भ उनके महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा व मुख्यमुनि महावीरकुमार ने तेरापंथ की स्थापना के विविध प्रसंगों का वर्णन किया।
मुंबई : आचार्य महाश्रमण (Acharya Mahashraman) सानिध्य में सोमवार को तेरापंथ स्थापना दिवस (Terapanth Foundation Day) का समारोह आयोजित हुआ। आरम्भ उनके महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा व मुख्यमुनि महावीरकुमार ने तेरापंथ की स्थापना के विविध प्रसंगों का वर्णन किया।
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि जब बीज बोया जाता है तो उसमें छिपा विशाल वृक्ष दिखाई नहीं देता। वह जब विशाल वृक्ष बन जाता है, तो बीज नहीं दिखाई देता। आज ही के दिन आचार्य भिक्षु ने भाव दीक्षा स्वीकार कर राजस्थान के केलवा में तेरापंथ के बीज का वपन किया और आज का यह कार्यक्रम उस बीज के वृक्ष का रूप है। आज तेरापंथ की स्थापना को 263 वर्ष हो गए। आचार्य भिक्षु के साथ कुछ साधु ही थे, किन्तु नियति का योग इस संघ का कितना विकास हुआ। साधु-साध्वियों व अन्य चारित्रात्माओं से मुमुक्षु संख्या वृद्धि की बात हमने बताई थी। मुमुक्षुओं की संख्या बढ़ती है तो संघ का विकास हो सकता है।
आचार्य भिक्षु को उस समय कितनी कठिनाईयां सामने आई होंगी, लेकिन उन्होंने उन कठिनाइयों को सत्व के बल पर पार किया। जीवन में सत्व हो तो सामान्य साधन सामग्री से भी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की जा सकता है। आचार्य भिक्षु से लेकर आचार्य तुलसी तक समय-समय पर विरोध होता रहा, लेकिन आचार्यों की दृढ़ आस्था व सत्व की शक्ति से सारे विरोध समाप्त होते गए।
साधु-साध्वियों को तेरापंथ के सिद्धांतों का अच्छा ज्ञान करने का प्रयास करना चाहिए। तेरापंथ के संदर्भ को समझने के लिए तेरापंथ के इतिहास और दर्शन का स्वाध्याय करना चाहिए। तेरापंथ दर्शन, इतिहास और मर्यादा-व्यवस्था को जितनी गहराई से समझा जाए, उतना विकास हो सकता है। तेरापंथ की गरिमा को और बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने मंगल प्रेरणा प्रदान करने के उपरान्त मुम्बई चतुर्मास को सम्पन्न कर औरंगाबाद अक्षय तृतीया तक के संभावित यात्रा पथ को बताया। तेरापंथ स्थापना दिवस के संदर्भ में संतवृन्द और साध्वीवृंद ने पृथक्-पृथक् गीत का संगान किया। अंत में आचार्यश्री ने पट्ट से नीचे खड़े हुए तो धर्मसंघ ने भी खड़े होकर उनके साथ संघगान किया।

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