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अमेरिका उतरते ही सारी हेंकड़ी हवा हो गई
By EditorialPublished on 28 March 2023 5:30 AM IST
अमेरिका (America ) आने वाले विदेशी नागरिकों को आव्रजन अधिकारियों द्वारा परेशान किये जाने के किस्से तो आये दिन सुनने को मिलते हैं, मगर एसा माना जाता रहा कि ज्यादातर यह परेशानी मुस्लिम (Muslim) नागरिकों के साथ ही पेश आती है जन सामान्य के साथ नहीं। यह धारणा उस वक्त तार तार हो गई जब 23 जुलाई 2016 की दोपहर मैं अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर उतरा।
न्यूयार्क : अमेरिका (America ) आने वाले विदेशी नागरिकों को आव्रजन अधिकारियों द्वारा परेशान किये जाने के किस्से तो आये दिन सुनने को मिलते हैं, मगर एसा माना जाता रहा कि ज्यादातर यह परेशानी मुस्लिम (Muslim) नागरिकों के साथ ही पेश आती है जन सामान्य के साथ नहीं। यह धारणा उस वक्त तार तार हो गई जब 23 जुलाई 2016 की दोपहर मैं अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर उतरा।
पिछले 40 से भी ज्यादा सालों से मैं सफेद कुर्ता पाजामा (White kurta pajama) वह भी खादी का ही पहनता आया हूं। 20 साल पहले जब मैं दूसरी बार अमेरिका आया था तब इस यात्रा के लिये जरूर पेन्ट शर्ट सिलवा लिये थे मगर तब भी कुर्ता पाजामा तो साथ लाया ही था। तब यात्रा के दौरान अत्यधिक गर्मी की वजह से एकाध बार कुर्ता पाजामा पहन कर बाहर भी निकला था। इस दौरान मैंने महसूस किया कि लोग मुझे घूर रहे हैं। मेरे भिन्न वस्त्रों के कारण यह स्वाभाविक भी था वैसे भारत (India) में भी मुझे इस तरह के व्यवहार की आदत है।
मेरे खादी के वस्त्रों के कारण भारत में अक्सर लोग मुझे नेता या मंत्री समझ जाते हैं। उनके कौतूहल पर मुझे मन ही मन हंसी आती है कि जब इन्हें पता चलेगा कि ये कोई मामूली पत्रकार (Journalist) है तब उनका मुँह देखने के काबिल होगा। अन्यत्र तो मंत्री या नेता आजकल खादी छोड़ बढिया वस्त्र पहनने लगे हैं, यह गैर कांग्रेसी दलों ही नहीं कांग्रेस के नेताओं में भी नजर आता है मगर महाराष्ट्र में आज भी राजनेता अधिकांशत: सफेद खादी ही पहनते हैं। मजा तो तब आता है जब मैं मुम्बई में गाड़ी से जा रहा होता हूं और मुझे देख पुलिस (Police) वाले सलाम ठोक देते हैं। 1997 की बात है, अमेरिका के शिकागो में एक लोकल ट्रेन (Local train) में सफर कर रहा था, तब मैंने यही कुर्ता पाजामा ही पहना हुआ था। मुझे देख ट्रेन में कुछ लोग कानाफूसी कर रहे थे तो उनके हाव भावों से मुझे आशंका हो गई कि ये मेरे बारे में कुछ अच्छा नहीं सोच रहे। ट्रेन में भीड़ बहुत थी, मुम्बई की लोकल ट्रेन की तरह ही लोग उतरते-चढ़ते जा रहे थे। मैं खड़े खड़े ही यात्रा कर रहा था, कुछ ही देर में एक स्टेशन पर वो लोग उतर गये तो मैं उनके स्थान पर जाकर बैठ गया। वहां एक भारतीय (Indian) को बैठा देख मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। बैठते ही मैंने उसकी तरफ मुस्करा कर देखा तो वह स्वत: ही पूछ बैठा - पाकिस्तान से हो क्या ? मेरे अचरज का ठिकाना नहीं था। जरूर मेरे वस्त्रों के कारण ही उसने यह अनुमान लगाया था। अब उन लोगों की कानाफूसी और संदेह का रहस्य खुल चुका था। मैंने मन ही मन ठान लिया कि अब भूल कर भी अमेरिका में कुर्ता पाजामा नहीं पहनना।
इस बार भी जब अमेरिका का कार्यक्रम बना तो सबसे पहले पेन्ट शर्ट सिलाने की ही सोची। मगर इसकी नोबत नहीं आई, मेरे भतीजे संदीप गोयल जो कि प्रात: काल जयपुर के सम्पादक हैं, के कपड़े मुझे एकदम फिट आ गये। पेन्ट जरूर लम्बे थे इसलिये कटवा लिये। कईयों ने कहा कि अभी तो गर्मी का मौसम है, कुर्ते पाजामे ही चल जायेंगे तो 20 साल पहले की घटना याद कर मैं सिहर उठा। तब पाकिस्तानियों (Pakistanis) के लिये एसी परिस्थिति थी तो आज के हालात तो बहुत विषाक्त हो चुके हैं। आज अगर मैं कुर्ता पाजामा पहनकर अमेरिका (America) में उतरूं तो आव्रजन अधिकारी ही मेरा भुर्ता बना दें, आगे की बात तो ओर है।
हमारा विमान निर्धारित समय से डेढ घंटा पहले ही पहुँच गया था। सभी यात्रियों को सामान एकत्र करने के पूर्व निर्धारित आव्रजन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। यह कार्य एक बहुत बड़े हाल में हो रहा था जो यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था। अमरीकी नागरिकों के लिये अलग कतार थी जिन्हें फटाफट जाने दिया जा रहा था मगर वीजीटर्स की बहुत लम्बी लम्बी कतारें थी। 60 काउन्टरों पर आव्रजन अधिकारी बैठे थे फिर भी भीड़ कम नहीं हो रही थी, कोई नई उड़ान आती तो यह भीड़ और बढ जाती। मैं भी एसी ही एक कतार में लग गया। आव्रजन अधिकारी प्रत्येक यात्री से तरह तरह के और खोद खोद कर प्रश्न कर रहे थे जिससे बहुत समय लग रहा था।
कुछ देर मैं कतार में खड़ा रहा तभी एक अधिकारी ने आवाज दी कि जो पर्यटक हैं उनकी कतार अलग है, मुझे समझ में नहीं आया कि पर्यटकों व वीजीटर्स में क्या अन्तर है। पर्यटकों हेतु कोई बोर्ड लगा नहीं था इसलिये मैं अपने आपको वीजीटर समझ इसी लाईन में लग गया था। अब मुझे एक अन्य लाईन में खड़ा कर दिया गया। यह लाईन पहले की अपेक्षा छोटी थी। पूरे हाल में अमेरिका के इतिहास की बहुत बड़ी बड़ी पेन्टिंगें (Paintings) लगी हुई थी। ये पेन्टिंगें इतनी भद्दी थी कि आश्चर्य हो रहा था कि किसने इस तरह की पेन्टिंगें यहां लगाने दी। इन्हें देखकर बरबस ही भारत की एक घटना याद आ गई। ए. के. एन्टोनी केन्द्रीय मंत्री (Central minister) थे, कहने को तो वे बहुत ईमानदार माने जाते हैं, मगर उनकी पत्नी द्वारा बनाई गई कुछ पेन्टिंगें एयर इण्डिया (Air India) द्वारा करोड़ों रूपयों में खरीद ली गई थीं। इन पेन्टिंगों को देखकर मुझे लगा कि जरूर यहां भी किसी बड़े व्यक्ति की मेहरबानी से ये खरीदी गई होंगी।
पर्यटकों के लिये भी 8-10 काउन्टर थे। ज्यादातर पर अश्वेत अधिकारी ही बैठे थे। मैंने देखा कि महिला अधिकारी फटाफट निपटा रही थी जबकि उसके पास वाला अधिकारी बहुत समय ले रहा था। मैं सोच रहा था कि मेरा क्रम महिला अधिकारी के समक्ष आये तो जल्दी निपट जायेंगे मगर एसा हुआ नहीं और मुझे उस सख्त अधिकारी की कतार में खड़ा कर दिया गया। अन्तत: मेरा क्रम भी आया। अधिकारी (Officer) ने तरह तरह के सवाल किये। पूछा किसलिये अमेरिका आये हो तो मैंने बताया कि घूमने आया हूं। कहां कहां जाओगे तो मैंने जहां जहां जाने का संभावित कार्यक्रम था बता दिया। उसके सामने कम्प्यूटर रखा था, उसमें सारी जानकारी भरी पड़ी थी, वह उसे पढता जा रहा था और मुझसे सवाल किये जा रहा था। इस बीच मेरी उंगलियों के निशान व चित्र भी ले लिये गये।
मैं सोच रहा था कि पूछताछ पूरी हो गई है, अब ये पासपोर्ट पर छाप लगाकर मुझे जाने को कह देगा तभी उसने सवाल दाग दिया कि आप यहां बिजनेस के कार्य से तो नहीं आये हो। मैंने साफ इन्कार कर दिया कि मैं सिर्फ घूमने के लिये ही आया हूं, वैसे भी मैं पत्रकार हूं और अखबार का मालिक हूं तो इससे सम्बन्धित कोई बिजनेस (Business) यहां हो ही नहीं सकता। उसने एक बार फिर यही सवाल किया तो मैं आश्चर्य में पड़ गया कि आखिर बार बार यह एक ही सवाल मुझसे क्यूं किये जा रहा.
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