मणिपुर की पहाड़ियों में एक बार फिर असंतोष की गूंज सुनाई दी, जब कुकी-जो समुदाय के हजारों लोग अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर सड़कों पर उतरे। तीन वर्षों से जारी जातीय हिंसा, विस्थापन और असुरक्षा के बीच यह प्रदर्शन केवल एक मांग नहीं, बल्कि एक लंबी पीड़ा और असंतोष की अभिव्यक्ति बनकर सामने आया।

चुराचांदपुर जिले में आयोजित इस रैली का नेतृत्व कुकी-जो काउंसिल और इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने किया। प्रदर्शनकारी सिएलमाट और कोइटे ग्राउंड से पैदल मार्च करते हुए पीस ग्राउंड पहुंचे। हाथों में बैनर और नारों के साथ जुटी भीड़ ने स्पष्ट शब्दों में अलग केंद्रशासित प्रदेश की मांग दोहराई और राज्य सरकार को अस्वीकार करने का संदेश दिया।

रैली के दौरान आयोजकों ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में मणिपुर जातीय हिंसा के सबसे गंभीर दौर से गुजरा है। इस हिंसा में अब तक कम से कम 258 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लगभग 60 हजार लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। पहाड़ी इलाकों में रहने वाले समुदायों के लिए सुरक्षा, भूमि अधिकार और पुनर्वास आज भी सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था उनकी समस्याओं को सुलझाने में असफल रही है। रैली के समापन पर एक ज्ञापन केंद्र सरकार को सौंपा गया, जिसमें भूमि अतिक्रमण, बफर जोन में पुनर्वास, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक उपेक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि जब तक राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे में मूलभूत बदलाव नहीं होगा, तब तक शांति की स्थायी बहाली संभव नहीं है।

इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में हाल ही में गुवाहाटी में हुई कुकी-जो नेताओं की बैठक भी अहम मानी जा रही है। उस बैठक में यह संकेत दिया गया था कि यदि अलग केंद्रशासित प्रदेश की मांग पर ठोस पहल नहीं होती, तो भविष्य में राज्य की राजनीतिक प्रक्रियाओं में भागीदारी पर पुनर्विचार किया जा सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब मणिपुर विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त होने वाला है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह रैली केवल एक क्षेत्रीय प्रदर्शन नहीं, बल्कि राज्य की मौजूदा शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अलग केंद्रशासित प्रदेश की मांग ने मणिपुर की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां जातीय पहचान, सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकार केंद्र में आ गए हैं।

प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन इसके संदेश को हल्के में लेना मुश्किल है। पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के बीच बढ़ती खाई, लगातार हिंसा और विस्थापन ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया है। कुकी-जो समुदाय की यह एकजुटता आने वाले समय में मणिपुर के राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श को किस दिशा में ले जाएगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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