क्या छिन जाएगा जयपुर से 'विश्व विरासत' का ताज? UNESCO की चिंताओं ने खड़े किए बड़े सवाल
जयपुर की ऐतिहासिक वॉल्ड सिटी पर बढ़ते अतिक्रमण और संरक्षण में लापरवाही को लेकर UNESCO ने चिंता जताई है। यदि समय रहते सुधार नहीं हुए, तो 2019 में मिला विश्व विरासत स्थल का दर्जा खतरे में पड़ सकता है। प्रशासन से दिसंबर 2026 तक विस्तृत संरक्षण रिपोर्ट मांगी गई है।

जयपुर
राजस्थान की राजधानी और “पिंक सिटी” के नाम से प्रसिद्ध जयपुर इन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर जांच के दायरे में है। संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक संस्था UNESCO ने शहर के ऐतिहासिक वॉल्ड सिटी क्षेत्र में बढ़ते अतिक्रमण, अवैध निर्माण और संरक्षण में लापरवाही को लेकर चिंता जताई है। यदि इन समस्याओं पर जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो जयपुर से विश्व विरासत स्थल का दर्जा छिनने का खतरा पैदा हो सकता है।
ऐतिहासिक शहर पर बढ़ता दबाव:
जयपुर का वॉल्ड सिटी क्षेत्र अपनी अनूठी स्थापत्य शैली, चौड़ी सड़कों, गुलाबी रंग की इमारतों और पारंपरिक बाजारों के कारण विश्व भर में पहचाना जाता है। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण इस क्षेत्र को वर्ष 2019 में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया था। हालांकि हाल के वर्षों में शहर के इस संरक्षित क्षेत्र में तेजी से हो रहे अतिक्रमण और अनियोजित विकास ने इसकी ऐतिहासिक पहचान पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, संरक्षित इलाके के भीतर अवैध निर्माण, नए व्यावसायिक प्रतिष्ठान और बिना अनुमति के किए जा रहे पुनर्विकास कार्य लगातार बढ़ रहे हैं। ये गतिविधियां उस ऐतिहासिक स्वरूप को प्रभावित कर रही हैं, जिसके कारण जयपुर को वैश्विक स्तर पर यह प्रतिष्ठित दर्जा मिला था।
संरक्षण में लापरवाही और बदलता स्वरूप:
विशेषज्ञों के अनुसार, कई पारंपरिक हवेलियां और ऐतिहासिक इमारतें समय के साथ जर्जर हो रही हैं। उनकी मरम्मत और संरक्षण के बजाय कई स्थानों पर आधुनिक डिजाइन वाले नए मुखौटे या संरचनाएं बनाई जा रही हैं। इससे न केवल शहर की मूल वास्तुकला प्रभावित हो रही है, बल्कि उसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। इसके अलावा, शहर में चल रहे कुछ बुनियादी ढांचा और परिवहन संबंधी विकास कार्यों को लेकर भी सवाल उठे हैं। यूनेस्को के अनुसार, ऐसे कई प्रोजेक्ट बिना पर्याप्त “हेरिटेज इम्पैक्ट असेसमेंट” के शुरू किए गए, जिससे ऐतिहासिक संरचनाओं और शहरी परिदृश्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
जयपुर की ऐतिहासिक विरासत:
जयपुर की स्थापना 1727 में कछवाहा शासक Sawai Jai Singh II ने की थी। यह शहर दक्षिण एशिया के शुरुआती योजनाबद्ध शहरों में से एक माना जाता है, जिसकी बसावट ग्रिड प्रणाली पर आधारित है। पारंपरिक वास्तु सिद्धांतों और वैज्ञानिक शहरी नियोजन के मिश्रण ने इसे उस दौर में एक अनूठा उदाहरण बना दिया था। वॉल्ड सिटी के भीतर स्थित कई ऐतिहासिक स्मारक आज भी इस गौरवशाली विरासत के प्रतीक हैं। इनमें प्रमुख रूप से हवा महल और सिटी पैलेस, जयपुर शामिल हैं, जो हर वर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
यूनेस्को ने जयपुर प्रशासन से इस पूरे मामले पर विस्तृत संरक्षण रिपोर्ट मांगी है। अधिकारियों को दिसंबर 2026 तक यह बताना होगा कि ऐतिहासिक वॉल्ड सिटी को अतिक्रमण और अव्यवस्थित विकास से बचाने के लिए कौन-कौन से ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। यदि निर्धारित समय के भीतर संतोषजनक प्रगति नहीं दिखाई देती है, तो जयपुर को पहले यूनेस्को की “वर्ल्ड हेरिटेज इन डेंजर” सूची में शामिल किया जा सकता है। स्थिति और गंभीर होने पर भविष्य में शहर से विश्व विरासत का दर्जा भी वापस लिया जा सकता है।
विश्व विरासत का दर्जा किसी भी शहर के लिए केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक नहीं होता, बल्कि यह पर्यटन, अंतरराष्ट्रीय पहचान और संरक्षण के लिए मिलने वाली वैश्विक सहायता को भी बढ़ाता है। जयपुर के मामले में यह दर्जा शहर की अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले एक से दो वर्ष जयपुर के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। यदि समय रहते अतिक्रमण पर नियंत्रण और ऐतिहासिक संरचनाओं का प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है, तो यह शहर अपनी वैश्विक पहचान को सुरक्षित रख सकता है। अन्यथा, सदियों पुरानी इस विरासत पर गंभीर खतरा मंडरा सकता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
