नवी मुंबई: सपनों के शहर को मिलने वाले दूसरे अंतरराष्ट्रीय प्रवेश द्वार, नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NMIA) ने अपने परिचालन के शुरुआती दौर में ही एक अभूतपूर्व विवाद को जन्म दे दिया है। यह विवाद उड़ानों की देरी या बुनियादी ढांचे को लेकर नहीं, बल्कि उस 'अदृश्य नेटवर्क' को लेकर है जिसके बिना आधुनिक यात्री स्वयं को दुनिया से कटा हुआ महसूस करता है। भारत की दिग्गज टेलीकॉम कंपनियों—एयरटेल, जियो और वोडाफोन-आइडिया—ने अडानी समूह द्वारा संचालित इस हवाई अड्डे पर "एकाधिकार" और "जबरन वसूली" जैसे गंभीर आरोप लगाकर कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है।

विवाद की जड़: 'राइट ऑफ वे' और एकाधिकार के आरोप

इस विवाद का मुख्य केंद्र 'राइट ऑफ वे' (Right of Way - RoW) है। टेलीकॉम कंपनियों के शीर्ष संगठन, 'सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (COAI) ने केंद्र सरकार और दूरसंचार विभाग (DoT) के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि हवाई अड्डा संचालक उन्हें अपना स्वतंत्र मोबाइल इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने की अनुमति नहीं दे रहा है।

आरोप है कि अडानी समूह टेलीकॉम कंपनियों पर अपना स्वयं का 'इन-बिल्डिंग सॉल्यूशन' (IBS) नेटवर्क उपयोग करने का अनुचित दबाव बना रहा है। इसके बदले में कंपनियों से कथित तौर पर 92 लाख रुपये प्रति माह के "अत्यधिक और मनमाने" शुल्क की मांग की जा रही है। टेलीकॉम ऑपरेटरों का तर्क है कि यह मांग न केवल आर्थिक रूप से शोषणकारी है, बल्कि यह स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं के 'पसंद के अधिकार' का भी सीधा उल्लंघन है।

वायरल बोर्ड और यात्रियों की दुविधा

विवाद ने तब तूल पकड़ा जब सोशल मीडिया पर एयरपोर्ट के एक डिस्प्ले बोर्ड की तस्वीर तेजी से वायरल हुई। इस बोर्ड पर यात्रियों को सूचित किया गया था कि एयरपोर्ट परिसर के भीतर एयरटेल, जियो और वोडाफोन के सिग्नल उपलब्ध नहीं हो सकते हैं, और यात्रियों को कनेक्टिविटी के लिए हवाई अड्डे के 'फ्री वाई-फाई' का उपयोग करना चाहिए। इस तस्वीर ने न केवल यात्रियों की चिंता बढ़ाई, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली, जहां सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में निजी हितों को यात्री सुविधा से ऊपर रखने पर सवाल उठाए गए।

अडानी समूह का पक्ष: सुरक्षा और सुगमता का तर्क

गंभीर आरोपों के बीच, हवाई अड्डा संचालक ने अपना पक्ष रखते हुए इन दावों का खंडन किया है। अडानी समूह का कहना है कि हवाई अड्डा एक उच्च-सुरक्षा वाला संवेदनशील क्षेत्र है। उनके अनुसार, पूरे परिसर में नेटवर्क के रखरखाव और गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए एक एकीकृत 'इन-बिल्डिंग सॉल्यूशन' (IBS) ही सबसे उपयुक्त विकल्प है। ऑपरेटर का तर्क है कि यदि कई टेलीकॉम वेंडर अलग-अलग मरम्मत और रखरखाव कार्य करेंगे, तो इससे हवाई अड्डे की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। समूह ने स्पष्ट किया कि एक 'न्यूट्रल होस्ट' के रूप में वे बेहतर सेवा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वर्तमान में सरकारी कंपनी BSNL इस सिस्टम पर परीक्षण भी कर रही है।

एक बड़ा संवैधानिक और तकनीकी सवाल

यह रस्साकशी केवल दो व्यापारिक गुटों के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि यह दूरसंचार अधिनियम, 2023 के तहत समान अधिकारों की व्याख्या का भी प्रश्न है। जहाँ एक ओर टेलीकॉम कंपनियां कानून के तहत बुनियादी ढांचा स्थापित करने के अपने अधिकार का दावा कर रही हैं, वहीं हवाई अड्डा संचालक परिचालन सुगमता को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इस कॉर्पोरेट युद्ध का सबसे गहरा प्रभाव आम यात्री पर पड़ रहा है। तकनीक के इस युग में, एक अत्याधुनिक हवाई अड्डे पर उतरने के बाद भी अपने परिजनों से संपर्क करने के लिए वाई-फाई के भरोसे रहना डिजिटल इंडिया के दौर में एक बड़ी विडंबना बनकर उभरा है। इस मामले में केंद्र सरकार का हस्तक्षेप ही अब भविष्य की दिशा तय करेगा।

Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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