क्यों वीर सावरकर ने स्वेच्छा से चुना था मृत्यु? और किस वजहों से वे कहे जाते है स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर और विवादास्पद नायक
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर और विवादास्पद नायक वीर सावरकर के 'आत्मार्पण' से लेकर उनके वैचारिक संघर्षों की विस्तृत गाथा। जानिए कैसे 26 दिनों के उपवास के बाद उन्होंने स्वेच्छा से मृत्यु का वरण किया और क्यों उनकी 'दया याचिका' एवं 'हिंदुत्व' की अवधारणा आज भी भारतीय राजनीति में चर्चा का मुख्य केंद्र बनी हुई है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्षितिज पर विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसे नक्षत्र की भांति उभरे, जिनकी चमक ने जितने लोगों को प्रेरित किया, उतनी ही राजनीतिक बहसों को भी जन्म दिया। 'वीर' की उपाधि से विभूषित सावरकर का जीवन केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह एक प्रखर विचारक, समाज सुधारक और लेखक भी थे। उनके देहावसान की घटना आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में एक अद्वितीय अध्याय के रूप में दर्ज है, क्योंकि उन्होंने मृत्यु का वरण किसी रोग के वश में होकर नहीं, बल्कि अपनी इच्छाशक्ति के बल पर किया था।
जनवरी 1966 में सावरकर ने एक ऐसी घोषणा की जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। उनका मानना था कि उनके जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो चुका है और अब यह शरीर समाज की सेवा के योग्य नहीं रहा। उन्होंने 'प्रायोपवेश' का मार्ग चुना, जिसे वे आत्महत्या नहीं बल्कि 'आत्मार्पण' कहते थे। 1 फरवरी 1966 से उन्होंने अन्न, जल और औषधियों का पूर्णतः त्याग कर दिया। 26 दिनों के इस कठोर उपवास के पश्चात 26 फरवरी 1966 को मुंबई स्थित 'सावरकर सदन' में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उनका दर्शन स्पष्ट था कि जब व्यक्ति की शारीरिक क्षमताएं समाप्त हो जाएं, तो उसे पराश्रित रहने के बजाय गरिमा के साथ मृत्यु को गले लगा लेना चाहिए।
सावरकर की मृत्यु जितनी शांत और दार्शनिक थी, उनकी राजनीतिक विरासत उतनी ही चर्चाओं के केंद्र में रही है। उनके योगदान को लेकर समाज आज भी दो स्पष्ट विचारधाराओं में बंटा हुआ नजर आता है। उनके जीवन का सबसे चर्चित पक्ष अंडमान की सेल्युलर जेल में बिताए गए वे कठिन वर्ष हैं, जहाँ उन्होंने अमानवीय यातनाएं झेलीं। इस दौरान उनके द्वारा ब्रिटिश सरकार को लिखी गई दया याचिकाओं को लेकर आलोचक उन पर समझौतावादी होने का आरोप लगाते हैं। इसके विपरीत, समर्थकों का एक बड़ा वर्ग इसे छत्रपति शिवाजी महाराज की कूटनीति से प्रेरित एक सामरिक चाल मानता है, जिसका उद्देश्य कारागार से मुक्त होकर पुनः राष्ट्र सेवा में संलग्न होना था।
विवादों की इस कड़ी में सावरकर द्वारा प्रतिपादित 'हिंदुत्व' की परिभाषा और 'द्वि-राष्ट्र सिद्धांत' का उल्लेख भी अनिवार्य हो जाता है। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि उनकी विचारधारा ने विभाजन की नींव को पुख्ता किया, जबकि उनके अनुयायी उन्हें एक ऐसे दूरदर्शी के रूप में देखते हैं जिसने हिंदू राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान को वैचारिक आधार प्रदान किया। इसके अतिरिक्त, द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारतीयों को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के उनके आह्वान को भी अक्सर संदेहास्पद दृष्टि से देखा जाता है, जिसे उन्होंने भारतीय युवाओं के सैन्यीकरण की एक दूरगामी रणनीति बताया था।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में सावरकर का नाम महात्मा गांधी की हत्या के मामले से भी जुड़ा, जिसने उनके सार्वजनिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। यद्यपि 1948 में साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने उन्हें ससम्मान दोषमुक्त कर दिया था, किंतु राजनीतिक मंचों पर यह विषय आज भी एक तीखी बहस का कारण बनता है। वीर सावरकर का व्यक्तित्व और उनके निर्णय भले ही मतभेदों के घेरे में रहे हों, लेकिन इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने भारतीय राजनीति और राष्ट्रवाद के विमर्श को एक नई दिशा दी। उनका जीवन संघर्ष, बलिदान और वैचारिक अडिगता का एक ऐसा संगम है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव शोध और विमर्श का विषय बना रहेगा।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
