भारत के दूर-दराज़ अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ यहाँ निवास करने वाली आदिवासी जनजातियों के लिए भी जाना जाता है। इनमें प्रमुख हैं शोम्पेन और निकोबारी जनजातियाँ, जो सदियों से इस द्वीप की मिट्टी, जंगल और समुद्र के साथ अपनी जीवनशैली को जोड़े हुए हैं।

शोम्पेन जनजाति अत्यंत कम संख्या में निवास करती है और इन्हें भारत की सबसे अल्पसंख्यक आदिवासी समूहों में गिना जाता है। ये मुख्य रूप से शिकार, मछली पकड़ने और जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। दूसरी ओर, निकोबारी जनजाति अपेक्षाकृत अधिक संगठित है और कृषि, मत्स्य पालन और समुद्री संसाधनों पर आश्रित होकर जीवन यापन करती है। दोनों जनजातियों की पहचान उनकी अनूठी बोली, रीति-रिवाज और पारंपरिक सांस्कृतिक गतिविधियों से होती है।

ग्रेट निकोबार द्वीप इन जनजातियों के लिए केवल निवास का स्थान नहीं है, बल्कि उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का भी आधार है। शोम्पेन और निकोबारी लोग अपने घरों, जंगलों और समुद्री क्षेत्रों में जीवनयापन करते हुए प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह निर्भर हैं। फल, जड़ी-बूटियाँ, मछली और समुद्री उत्पाद उनकी दैनिक ज़रूरतों का मुख्य आधार हैं। वहीं, कृषि और बुनाई जैसी पारंपरिक कलाएँ निकोबारी जनजाति की जीवनशैली का हिस्सा हैं।

शोम्पेन और निकोबारी जनजातियाँ अपनी सांस्कृतिक पहचान में बेहद समृद्ध हैं। उनके उत्सव, गीत-संगीत, लोकनृत्य और हस्तकला उन्हें अन्य जनजातियों से अलग पहचान देते हैं। निकोबारी समुदाय में पारिवारिक और सामूहिक जीवन का महत्व उच्च है, वहीं शोम्पेन अपने सीमित समूहों में स्वतंत्र और सरल जीवन शैली अपनाते हैं। इनके पारंपरिक गीत, कथाएँ और लोककथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित हैं।

ग्रेट निकोबार द्वीप उत्तर-पूर्वी हिंद महासागर में स्थित है और भारत की सीमाओं के भीतर द्वीपसमूह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह द्वीप शोम्पेन और निकोबारी दोनों के लिए प्राकृतिक आवास, शिकार और मछली पकड़ने का क्षेत्र रहा है। इतिहास में इनके अस्तित्व के प्रमाण कई शताब्दियों पुराने हैं; कुछ विद्वानों के अनुसार ये जनजातियाँ सैकड़ों वर्षों से इस द्वीप पर स्थायी रूप से निवास कर रही हैं।

सरकार ने इन आदिवासी समूहों के जीवन और उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए कई कानून बनाए हैं। ग्रेट निकोबार द्वीप को संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है और यहाँ पर्यावरणीय संरक्षण के साथ-साथ जनजातियों के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया गया है। यह कदम उनके पारंपरिक जीवन और संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

शोम्पेन और निकोबारी जनजातियाँ न केवल ग्रेट निकोबार की सांस्कृतिक विरासत हैं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का भी जीवंत उदाहरण हैं। इनकी संरक्षण आवश्यकताएँ और जीवनशैली हमें यह याद दिलाती हैं कि विकास और प्राकृतिक संतुलन के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। इन अनछुई आदिवासी संस्कृतियों को समझना और उनका संरक्षण करना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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