कौन थे 19वीं सदी के जिन्होंने पाए थे माँ काली और येशु के दर्शन? रामकृष्ण परमहंस जन्मतिथि पर जानें उनकी साधना का गुप्त सच
18 फरवरी 2026 को श्री रामकृष्ण परमहंस जयंती पर उनके जीवन, माँ काली की साधना, इस्लाम और ईसाई धर्म के अभ्यास तथा “सभी धर्म एक हैं” के संदेश को स्मरण किया जाएगा। जानिए कैसे 19वीं सदी के इस महान संत ने आध्यात्मिक एकता का वैश्विक संदेश दिया।

रामकृष्ण परमहंस जयंती
18 फरवरी 2026 को देशभर में महान संत और आध्यात्मिक विभूति रामकृष्ण परमहंस की जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। 19वीं सदी के इस अद्वितीय संत ने न केवल भारतीय अध्यात्म को नई दिशा दी, बल्कि विश्व को यह संदेश दिया कि सभी धर्म अंततः एक ही परम सत्य की ओर ले जाते हैं। उनका जीवन साधना, अनुभव और आत्मानुभूति की ऐसी कथा है, जो आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
18 फरवरी 1836 को बंगाल प्रेसीडेंसी के कामारपुकुर गांव में जन्मे रामकृष्ण का बाल्यकालीन नाम गदाधर था। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिक प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देने लगी थी। नौ वर्ष की आयु में ब्राह्मण परंपरा के अनुसार उनका उपनयन संस्कार हुआ, जिसके बाद वे नियमित रूप से पूजा-पाठ में संलग्न रहने लगे। कहा जाता है कि बाल्यकाल में ही उन्होंने ‘भव-समाधि’ या ‘सविकल्प-समाधि’ जैसी गहन आध्यात्मिक अवस्थाओं का अनुभव किया। शिवरात्रि के अवसर पर नाटक में भगवान शिव की भूमिका निभाते समय तथा देवी विशालाक्षी की आराधना करते हुए उन्हें अलौकिक अनुभूतियाँ हुईं।
शिक्षा से अधिक आध्यात्मिकता की ओर झुकाव:
गांव के विद्यालय में उन्होंने पढ़ना-लिखना सीखा, परंतु गणित में उनकी विशेष रुचि नहीं रही। वे रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन करते थे। विद्वानों को केवल धन अर्जन की ओर उन्मुख देखकर उन्होंने सांसारिक मोह से दूरी और वैराग्य को जीवन का आधार बनाया।
दक्षिणेश्वर और माँ काली का साक्षात्कार:
लगभग 20 वर्ष की आयु में वे कोलकाता के दक्षिणेश्वर स्थित काली मंदिर में पुजारी बने। यहीं से उनकी आध्यात्मिक साधना ने नया मोड़ लिया। वे माँ काली की उपासना में इतने तल्लीन हो जाते कि कई बार समाधि की अवस्था में पहुँच जाते। उनकी तीव्र साधना और भाव-विभोर प्रार्थनाएँ अंततः उस क्षण तक पहुँचीं, जब उन्होंने माँ काली के साक्षात्कार का अनुभव किया। यह अनुभव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। वे प्रायः मंदिर के समीप के एकांत उपवन में ध्यान करते और भक्ति-गीतों के माध्यम से देवी से संवाद स्थापित करते।
विभिन्न धर्मों की साधना:
रामकृष्ण का आध्यात्मिक दृष्टिकोण केवल एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने वैष्णव भक्ति, तांत्रिक शाक्त साधना और अद्वैत वेदांत का अभ्यास किया। 1865 में वेदांत संन्यासी तोता पूरी से संन्यास की दीक्षा प्राप्त की। 1866 में गोविंद राय नामक साधक के मार्गदर्शन में उन्होंने इस्लाम की साधना की। तीन दिनों तक वे पूर्णतः इस्लामी परंपरा के अनुसार जीवन जीते रहे—अल्लाह का नाम जपते, नमाज़ अदा करते और हिंदू देवमूर्तियों से दूरी बनाए रखते। अंततः उन्होंने इस मार्ग से भी परम सत्य के साक्षात्कार का अनुभव किया। इसके बाद 1873-74 के दौरान उन्होंने ईसाई धर्म का अभ्यास किया। बाइबिल का अध्ययन करने के पश्चात उन्हें ईसा मसीह का दिव्य दर्शन हुआ, जिसमें उन्होंने स्वयं को सर्वव्यापक ब्रह्म के साथ एकाकार अनुभव किया।
विवाह और पारिवारिक जीवन:
1859 में सामाजिक परंपरा के अनुसार उनका विवाह सारदा देवी से हुआ। यह विवाह आध्यात्मिक आधार पर स्थापित रहा और सांसारिक अर्थों में संपन्न नहीं हुआ। बाद में माता शारदा देवी स्वयं एक महान आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। उनकी यह साधना इस निष्कर्ष पर पहुँची कि सभी धर्म “एक ही लक्ष्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग” हैं।
गुरु के रूप में प्रतिष्ठा और रामकृष्ण मिशन:
दक्षिणेश्वर में उनके उपदेशों की ख्याति फैलने लगी। सामाजिक नेता, बुद्धिजीवी और सामान्य जन उनके शिष्य बनने लगे। यद्यपि वे स्वयं को गुरु मानने में संकोच करते थे, परंतु उनके व्यक्तित्व और अनुभवों ने उन्हें एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित कर दिया। उनके शिष्यों ने आगे चलकर रामकृष्ण मठ और मिशन की स्थापना की, जिसने शिक्षा, सेवा और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाई।
16 अगस्त 1886 को उनका देहावसान हुआ, किंतु उनकी शिक्षाएँ आज भी जीवंत हैं। वे अपने अनुयायियों द्वारा ‘अवतार’ माने जाते हैं। उनका जीवन इस तथ्य का प्रमाण है कि सत्य की खोज किसी एक पंथ की बपौती नहीं है। उन्होंने अनुभव के माध्यम से सिद्ध किया कि ईश्वर की प्राप्ति के अनेक मार्ग हो सकते हैं, परंतु लक्ष्य एक ही है। 18 फरवरी 2026 को उनकी जयंती केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि उस सार्वभौमिक संदेश का पुनर्स्मरण है जो मानवता को एकता, सहिष्णुता और आध्यात्मिक जागरण की दिशा दिखाता है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
