आखिर कौन था माओ जे़दोंग? संसद में अमित शाह ने क्यों उसे बताया नक्सलियों का प्रेरणास्रोत?
संसद में गृह मंत्री अमित शाह की हुंकार ने नक्सलवाद के खात्मे की नई पटकथा लिख दी है। जानिए कौन था माओ जे़दोंग और कैसे उसकी 'बंदूक वाली क्रांति' ने भारत को दशकों तक जख्म दिए। इस लेख में पढ़ें माओवादी विचारधारा के उदय, नक्सलबाड़ी आंदोलन के इतिहास और भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों के 'रेड कॉरिडोर' को ध्वस्त करने की पूरी कहानी, जो अब अंत की ओर है।

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के शब्दों ने एक ऐसी गर्जना की है, जिसने न केवल विपक्षी खेमे को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया, बल्कि उन नक्सली ताकतों की जड़ों को भी झकझोर दिया है जिन्होंने दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा को लहूलुहान किया था। गृह मंत्री की इस घोषणा ने स्पष्ट कर दिया है कि जिस माओवादी विचारधारा ने देश को अंदरूनी रूप से खोखला करने का दुस्साहस किया था, उसे वर्तमान सरकार की रणनीतिक और सैन्य कार्रवाई ने अब खात्मे की कगार पर पहुंचा दिया है। इस ऐतिहासिक मोड़ पर आज समूचा राष्ट्र एक बुनियादी सवाल की गहराई टटोल रहा है कि आखिर कौन था 'माओ' और क्यों भारत के जंगलों में खूनी संघर्ष करने वाले इन विद्रोहियों को 'माओवादी' कहा जाता है।
माओ जे़दोंग, जिसे 'चेयरमैन माओ' के नाम से जाना जाता है, आधुनिक चीन के इतिहास का वह सबसे प्रभावशाली और विवादित अध्याय है, जिसने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की नींव रखी। एक किसान परिवार में जन्मा माओ, मार्क्सवाद-लेनिनवाद की विचारधारा को चीनी सांचे में ढालकर 'माओवाद' का जनक बना। उसकी रणनीतियां, विशेषकर 'गुरिल्ला युद्ध' और 'बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति' के सिद्धांत ने दुनिया भर के उग्रपंथी आंदोलनों को दिशा दी। चीन में भूमि पुनर्वितरण और औद्योगीकरण के नाम पर चलाए गए उसके अभियानों, जैसे 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' और 'सांस्कृतिक क्रांति' को इतिहास ने लाखों मौतों और अकल्पनीय हिंसा के लिए याद किया है। यही वह विचारधारा थी जिसने भारतीय सरजमीं पर 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए अपनी जड़ें जमाईं, जहां चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नेताओं ने ग्रामीण विद्रोह को हथियार बनाकर सशस्त्र संघर्ष का बिगुल फूंका।
कानूनी और आधिकारिक सुरक्षा ढांचे के तहत भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में नक्सलवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। गृह मंत्री ने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए संकेत दिया है कि कभी देश के 180 जिलों में फैला 'लाल गलियारा' (रेड कॉरिडोर) अब सिमटकर महज 12 जिलों तक रह गया है। सुरक्षा बलों के 'ऑपरेशन स्टीपलचेज़' से लेकर आधुनिक 'ग्रेहाउंड्स' और अन्य विशेष बलों की सक्रियता ने नक्सलियों के सुरक्षित किलों को ध्वस्त कर दिया है। सरकार की इस सफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि हिंसा के बल पर लोकतांत्रिक सत्ता को चुनौती देने का दौर अब समाप्त हो चुका है। आधिकारिक पक्ष का मानना है कि विचारधारा की आड़ में होने वाली यह हिंसा अब अपने अंतिम अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
गृह मंत्री की यह 'दहाड़' केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि उस दर्दनाक युग के अंत का औपचारिक उद्घोष है जिसने भारत के विकास की गति को बाधित किया था। नक्सलवाद का यह सिमटता दायरा और माओवादी विचारधारा की पराजय इस बात का प्रमाण है कि विकास और दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने बंदूक की राजनीति कभी टिक नहीं सकती। यह घटनाक्रम न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि उन हजारों निर्दोषों और सुरक्षाकर्मियों के लिए एक सच्ची श्रद्धांजलि भी है, जिन्होंने इस विचारधारा की बलिवेदी पर अपनी जान गंवाई थी। अब सवाल यह नहीं है कि नक्सलवाद कब खत्म होगा, बल्कि यह है कि इस विचारधारा के अवशेषों को जड़ से मिटाकर विकास की नई इबारत कैसे लिखी जाएगी।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
