श्री गुरु तेग बहादुर जी, सिख धर्म के नौवें गुरु, जिन्होंने 21 अप्रैल 1621 को जन्म लिया, ने न केवल सिख धर्म बल्कि पूरे मानव इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उनका बलिदान, जो 24 नवंबर 1675 को दिल्ली में हुआ, आज भी मानवता, साहस और नैतिक उदारता का प्रतीक बना हुआ है।

गुरु तेग बहादुर जी ने मुगल साम्राज्य के अत्याचारी शासक औरंगज़ेब की नीतियों का दृढ़ता से विरोध किया। जब उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने का दबाव डाला गया, तो गुरु जी ने कहा, "सीस कटा सकते हैं, पर केश नहीं।" इस साहसिक अडिगता के कारण उन्हें दिल्ली के चांदनी चौक में 11 नवम्बर 1675 को जल्लाद जलालदीन ने तलवार करके गुरु साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया। गुरु साहिब ने अपने अंतिम क्षणों में भी नतमस्तक नहीं हुए और मुँह से 'सी' तक नहीं कहा।

गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान केवल धार्मिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था। उनके अद्वितीय साहस ने मानवाधिकारों, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों की रक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। उनके बलिदान की याद में दिल्ली में गुरुद्वारा शीशगंज साहिब और गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब स्थापित हैं, जो उनके बलिदान और अंतिम संस्कार स्थलों की याद दिलाते हैं।

सिख पंथ के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने ग्रंथ ‘बिचित्र नाटक’ में गुरु साहिब के साहस और बलिदान का वर्णन करते हुए लिखा है कि उन्होंने धर्म के लिए अपना सीस दिया, पर सिर कभी नहीं झुका। उनके बलिदान ने सिखों में केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता और संघर्ष की भावना को भी मजबूती प्रदान की।

विशेषज्ञों के अनुसार, गुरु अर्जन देव की शहादत ने सिख पंथ को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया, वहीं गुरु तेग बहादुर की शहादत ने मानवाधिकारों की रक्षा और विचारों की स्वतंत्रता को सिख पहचान का आधार बनाया। उनके नौ वर्षीय पुत्र, गुरु गोबिंद सिंह पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने आगे चलकर खालसा पंथ की स्थापना में मार्गदर्शन किया।

वर्ष 2025 में उनके 350वें बलिदान दिवस के अवसर पर, कुछ राज्यों में इस दिन को 25 नवंबर को मनाया जाएया, जबकि पंजाब, दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों में यह परंपरागत रूप से 24 नवंबर को ही मान्यता प्राप्त है। छात्रों और अभिभावकों को अपने स्थानीय स्कूल या सरकारी प्रशासन से छुट्टी की पुष्टि करने की सलाह दी जाती है। यह ध्यान देने योग्य है कि 11 नवंबर को मनाया जाने वाला रिमेम्ब्रेंस डे (Remembrance Day) पूरी तरह से अलग है और विश्व युद्ध प्रथम के समापन की याद में मनाया जाता है। इसे गुरु तेग बहादुर की शहादत दिवस से भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।

गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि धार्मिक स्वतंत्रता, नैतिक साहस और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी समय संघर्ष और समर्पण की आवश्यकता होती है। उनकी शहादत न केवल सिख धर्म के इतिहास में, बल्कि पूरी मानव सभ्यता में एक स्थायी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

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Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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