जब बिना लड़े ही आधी जंग जीत गए थे शिवाजी ; जानें आखिर क्या हुआ जब अफजल खान ने छत्रपति शिवाजी महाराज को लगाया था गले?
शिवाजी महाराज की प्रतापगढ़ विजय की गाथा, जिसमें १६ वर्षीय शिवाजी महाराज ने रणनीति और साहस के बल पर बीजापुर सेनाओं को पराजित कर मराठा साम्राज्य की नींव रखी। यह घटना उनके अद्वितीय नेतृत्व और युद्ध कौशल का प्रतीक है।

शिवाजी महाराज का अफज़ल खान से टकराव
१६वीं सदी के महान सेनापति और भोंसले वंश के संस्थापक शिवाजी शाहाजी भोंसले का नाम भारतीय इतिहास में साहस, रणनीति और शासन-कुशलता के प्रतीक के रूप में अमर है। पुणे जिले के जुन्नर के समीप स्थित शिवनेरी किले में जन्मे शिवाजी महाराज को उनकी माता ने स्थानीय देवी शिवाई देवी के नाम पर नामांकित किया। महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनकी जयंती 19 फरवरी को शिवाजी जयंती के रूप में मनाई जाती है, हालांकि उनके जन्म की सटीक तिथि पर विद्वानों में मतभेद विद्यमान है।
किलों पर विजय और सामरिक विस्तार:
१६ वर्ष की आयु में ही शिवाजी महाराज ने तोरणा किले पर कब्ज़ा कर अपनी सैन्य और रणनीतिक प्रतिभा का परिचय दिया। उस समय बीजापुर दरबार में स्वास्थ्य कारणों से अस्थिरता थी, जिसका लाभ उठाकर शिवाजी महाराज ने किले में रखे विशाल खजाने को अपने कब्ज़े में लिया। इसके पश्चात उन्होंने पुणे के समीप कई महत्वपूर्ण किलों जैसे पुरंदर,कोंढाना और चाकण पर अधिकार स्थापित किया। पूर्वी पुणे के सुपा, बरामती और इंदापुर क्षेत्रों को भी अपने नियंत्रण में लाने के बाद, शिवाजी महाराज ने तोरणा किले का खजाना इस्तेमाल कर राजगड किला बनवाया, जो दस वर्षों तक उनके शासन का केंद्र बना। इसके बाद उन्होंने पश्चिम की ओर मोड़ लिया और कोंकण क्षेत्र में स्थित महत्वपूर्ण नगर कल्याण पर अधिकार कर लिया।
बीजापुर सल्तनत की प्रतिक्रिया:
बीजापुर सल्तनत ने शिवाजी के इन सामरिक सफलताओं को गंभीरता से लिया। १६५७ में सुल्तान के प्रतिनिधि अफज़ल खान को शिवाजी महाराज को पकड़ने के लिए भेजा गया। इससे पहले बीजापुर सेनाओं ने शिवाजी महाराज के परिवार के लिए महत्वपूर्ण तुलजा भवानी मंदिर और विठोबा मंदिर का अपमान किया।
शिवाजी ने प्रतापगढ़ किले की शरण ली, जहां उनके कई सहयोगियों ने उन्हें आत्मसमर्पण करने की सलाह दी। किले पर दोनों सेनाओं के बीच गतिरोध बना रहा। दो महीने के बाद अफज़ल खान ने शिवाजी महाराज से निजी वार्ता करने के लिए आमंत्रित किया। 10 नवंबर 1659 को प्रतापगढ़ किले के समीप दोनों सेनापतियों की मुलाकात हुई। मुलाकात में केवल तलवारें और एक-एक सहयोगी उपस्थित थे।
अफज़ल खान से टकराव और निर्णायक विजय:
शिवाजी महाराज ने अफज़ल खान की साजिश को भांपते हुए अपनी बाहों में कवच और बाघनाख छुपाया तथा दाहिनी हाथ में कृपाण तैयार रखा। दोनों के बीच तीव्र संघर्ष हुआ, जिसमें अफज़ल खान मारा गया। इसके बाद शिवाजी महाराज ने अपने छिपे हुए सैनिकों को संकेत दिया और बीजापुर सेना पर प्रहार करने का आदेश दिया। प्रतापगढ़ युद्ध में शिवाजी की सेना ने निर्णायक सफलता प्राप्त की।
इस युद्ध में बीजापुर की 3,000 से अधिक सेना हताहत हुई, जबकि अफज़ल खान के दो पुत्र और कई वरिष्ठ अधिकारी बंदी बनाए गए। विजय के उपरांत शिवाजी महाराज ने बंदी बनाए गए सैनिकों को उदारता दिखाते हुए भोजन, धन और उपहार देकर उनके घर भेज दिया और अपने मराठा सैनिकों को सम्मानित किया। यह घटना न केवल शिवाजी महाराज की सैन्य और रणनीतिक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि मराठा साम्राज्य की नींव को भी मजबूती प्रदान करती है। प्रतापगढ़ की इस महाकाव्य लड़ाई ने शिवाजी महाराज को ऐतिहासिक गौरव और स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में पहला बड़ा कदम प्रदान किया।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
