भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएँ ऐसी दर्ज हैं, जो केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि रणनीति, साहस और सूझबूझ की अद्भुत मिसाल बन जाती हैं। मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज और बीजापुर के सेनापति अफजल खान के बीच वर्ष 1659 में हुई मुलाकात ऐसी ही एक घटना थी। इस ऐतिहासिक प्रसंग में एक छोटे से गुप्त हथियार ‘बाघ नख’ ने निर्णायक भूमिका निभाई और मराठा शक्ति के उत्थान की दिशा बदल दी।


बाघ नख क्या है?

‘बाघ नख’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है बाघ के पंजे। यह एक छोटा, हाथ में छिपाकर रखने योग्य हथियार होता है, जिसकी बनावट बाघ के नुकीले पंजों जैसी होती है। इसे उंगलियों के बीच पहनकर या हथेली में छिपाकर रखा जाता था। निकट दूरी के संघर्ष में अचानक वार करने के लिए यह अत्यंत प्रभावी माना जाता था। इसकी संरचना ऐसी होती थी कि शत्रु को गंभीर रूप से घायल किया जा सके, जबकि इसे छिपाकर ले जाना संभव हो।


वर्ष 1659 में बीजापुर सल्तनत के शक्तिशाली सेनापति अफजल खान को शिवाजी महाराज के विरुद्ध अभियान पर भेजा गया। दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर था। अंततः प्रतापगढ़ किले की तलहटी में दोनों नेताओं की भेंट का निर्णय हुआ। यह मुलाकात औपचारिक रूप से शांतिपूर्ण वार्ता के लिए तय की गई थी, किंतु परिस्थितियाँ अप्रत्याशित मोड़ लेने वाली थीं।

इतिहासकारों के अनुसार, मुलाकात के दौरान अफजल खान ने शिवाजी महाराज पर अचानक हमला करने का प्रयास किया। शिवाजी महाराज पहले से सतर्क थे। उन्होंने अपने वस्त्रों के भीतर सुरक्षात्मक कवच धारण कर रखा था और साथ ही गुप्त रूप से बाघ नख भी छिपाकर रखा था। जैसे ही उन पर हमला हुआ, उन्होंने आत्मरक्षा में बाघ नख का प्रयोग किया। इस संघर्ष में अफजल खान गंभीर रूप से घायल हुआ और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। यह घटना मराठा साम्राज्य के लिए निर्णायक सिद्ध हुई। अफजल खान की पराजय ने न केवल बीजापुर की सैन्य शक्ति को झटका दिया, बल्कि शिवाजी महाराज की रणनीतिक कुशलता और नेतृत्व को भी व्यापक मान्यता दिलाई। इसके बाद मराठा शक्ति का प्रभाव क्षेत्र तेजी से विस्तारित हुआ।

बाघ नख की वर्तमान स्थिति:

ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, शिवाजी महाराज द्वारा प्रयुक्त बाघ नख का एक नमूना लंबे समय तक ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया था। वर्ष 2023 में महाराष्ट्र सरकार के प्रयासों से इसे भारत लाया गया और मुंबई में प्रदर्शित किया गया। यह वापसी केवल एक ऐतिहासिक वस्तु का पुनर्स्थापन नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के सम्मान और ऐतिहासिक स्मृति के पुनर्जीवन का प्रतीक भी बनी। बाघ नख आज केवल एक हथियार नहीं, बल्कि एक युग की स्मृति है। यह उस साहस, दूरदर्शिता और रणनीतिक सूझबूझ का प्रतीक है जिसने मराठा साम्राज्य की नींव को मजबूत किया। प्रतापगढ़ की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि युद्ध केवल शक्ति से नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता और तैयारी से भी जीते जाते हैं।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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