क्या है 'रलिव, गलिव या चलिव' जिसने कश्मीर के इतिहास को कर दिया था लहूलुहान, जानें 36 साल के संघर्ष की अनसुनी दास्तां
कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन की 36वीं बरसी पर एक विस्तृत रिपोर्ट। उग्रवाद, “रलिव, गलिव, चलिव” नारे के अर्थ, लक्षित हिंसा और एक शिक्षिका के साथ हुई क्रूर घटना के माध्यम से उस दौर की भयावह सच्चाई और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का तथ्यात्मक वर्णन।

कश्मीरी पंडित पलायन 1990
जनवरी की ठंडी रातों में कश्मीर घाटी ने वह सन्नाटा देखा, जो केवल भय और अनिश्चितता से उपजता है। वर्ष 1990 की शुरुआत में कश्मीरी पंडित समुदाय का सामूहिक पलायन केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं था, बल्कि इतिहास के उन अध्यायों में शामिल हो गया जिसने हजारों परिवारों की जड़ों को उखाड़ दिया। आज, उस त्रासदी की 36वीं बरसी पर, घाटी से उजड़े जीवन, टूटे घर और अधूरे सपनों की स्मृतियां एक बार फिर सामने आती हैं।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में कश्मीर में उग्रवाद के उभार के साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर कश्मीरी पंडितों, के खिलाफ लक्षित धमकियां तेज होती गईं। पोस्टरों, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों और दीवारों पर लिखे नारों के जरिए खुलेआम चेतावनियां दी गईं। इसी दौर में “रलिव, गलिव, चलिव” का नारा व्यापक रूप से सुनाई देने लगा। कश्मीरी भाषा में इसका अर्थ था धर्म बदलो, मरो या कश्मीर छोड़ दो। यह नारा केवल शब्द नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था, जिसने भय के माहौल को निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया।
लगातार हत्याओं, अपहरणों और धमकियों के बीच जनवरी 1990 में हालात ऐसे बने कि हजारों कश्मीरी पंडित परिवारों ने रातोंरात अपने घर छोड़ दिए। वे अपने पीछे सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत, मंदिर, पुस्तकें और स्मृतियां छोड़कर निकले। जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में शरणार्थी शिविरों में जीवन शुरू हुआ—जहां तंग हालात, बीमारी और पहचान का संकट लंबे समय तक बना रहा।
इस हिंसक दौर में एक नाम अत्याचार की प्रतीकात्मक कहानी बनकर उभरा—गिरिजा टीकू। वह घाटी में कार्यरत एक शिक्षिका थीं, जिन्होंने पलायन के बावजूद अपनी नौकरी के कारण लौटने का फैसला किया। वर्ष 1990 में उन्हें अगवा कर लिया गया। बाद में सामने आई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया—उनके साथ अमानवीय हिंसा की गई और अंततः उनकी हत्या कर दी गई। यह मामला कश्मीरी पंडितों के खिलाफ लक्षित हिंसा की भयावहता को उजागर करने वाला उदाहरण बना। वर्षों बाद इस अपराध में शामिल दोषियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया चली, जिसने न्यायिक व्यवस्था के सामने भी कई सवाल खड़े किए।
सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक बयानों में इस पलायन को सुरक्षा संकट और कानून-व्यवस्था के पतन से जोड़ा गया। समय-समय पर पुनर्वास योजनाएं, मुआवजा पैकेज और सुरक्षित वापसी की घोषणाएं की गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकांश विस्थापित परिवार आज भी स्थायी समाधान की प्रतीक्षा में हैं। नई पीढ़ी ने कश्मीर को केवल अपने माता-पिता की स्मृतियों और कहानियों में जाना है।
36 वर्ष बाद, यह बरसी केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक पीड़ा को समझने का क्षण है जिसने भारत के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव डाला। कश्मीरी पंडितों का पलायन आज भी न्याय, पुनर्वास और स्मृति के सवालों के साथ खड़ा है—एक ऐसा अध्याय, जिसे भुलाया नहीं जा सकता और जिसे समझे बिना भविष्य की राह तय करना अधूरा रहेगा।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
