बंगाल में ओबीसी कोटे पर सुवेंदु सरकार का बड़ा दांव; विधानसभा से पास हुए दो अहम बिल
कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में राज्य सरकार ने बिना सर्वे वाली 113 श्रेणियों को हटाकर ओबीसी आरक्षण ढांचे में बड़ा बदलाव किया है।

कोलकाता में पश्चिम बंगाल विधानसभा सत्र के दौरान सदस्यों की उपस्थिति के बीच अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित किए जाने का संदर्भ।
West Bengal OBC Reservation Bill : पश्चिम बंगाल की सियासत और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित करने वाले एक बेहद बड़े घटनाक्रम में राज्य विधानसभा ने सोमवार को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण से जुड़े दो अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन विधेयकों को अपनी मंजूरी दे दी है। सदन के भीतर भारी राजनीतिक गहमा-गहमी और तीखी बहस के बीच इन विधेयकों के पक्ष में 186 विधायकों ने अपनी सहमति का बटन दबाया, जबकि 17 सदस्यों ने इसके खिलाफ मतदान किया और छह विधायक इस पूरी प्रक्रिया से दूर रहे। इन दोनों नए कानूनों के पारित होने के साथ ही राज्य में दशकों पुरानी ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था में एक आमूलचूल बदलाव का सूत्रपात हो गया है। नए विधायी प्रावधानों के तहत अब राज्य में ओबीसी आरक्षण के कुल ढांचे को 17 प्रतिशत से भारी कटौती करते हुए महज 7 प्रतिशत पर समेट दिया गया है, जिसने राज्य की पूरी आरक्षण नीति को एक नए धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है।
इस दूरगामी विधायी प्रक्रिया को अंजाम देते हुए राज्य के पिछड़ा वर्ग विकास मंत्री गौरिशंकर घोष ने विधानसभा के पटल पर 'पश्चिम बंगाल बैकवर्ड क्लासेज (एससी-एसटी को छोड़कर) रिजर्वेशन ऑफ वैकेंसी इन सर्विसेज एंड पोस्ट अमेंडमेंट बिल, 2026' और 'पश्चिम बंगाल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेज अमेंडमेंट बिल, 2026' को आधिकारिक रूप से पेश किया। विधायी प्रस्तावों का पुरजोर बचाव करते हुए विभागीय मंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि सरकार का यह कदम किसी भी प्रकार की राजनीतिक मंशा या चुनावी नफे-नुकसान से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों और दिशा-निर्देशों के अनुपालन में उठाया गया एक आवश्यक विधिक कदम है।
कानूनी शुद्धीकरण की इस प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार ने ओबीसी श्रेणियों का व्यापक स्तर पर पुनर्गठन किया है। मंत्री गौरिशंकर घोष ने सदन के समक्ष इस बात का विशेष खुलासा किया कि पूर्व में बिना किसी पुख्ता और आधिकारिक फील्ड सर्वे के राजनीतिक लाभ के लिए सूची में शामिल की गई 113 श्रेणियों को इस नए संशोधन के जरिए सूची से पूरी तरह निष्कासित कर दिया गया है। इसके विपरीत, जिन 66 उप-श्रेणियों को विभिन्न प्रामाणिक सर्वेक्षणों और ठोस वैज्ञानिक आधारों पर योग्य पाया गया था, उन्हें आरक्षण के दायरे में पूरी तरह बरकरार रखा गया है। सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि पुनर्गठित बैकवर्ड क्लासेज आयोग अब भविष्य में दावों की पूरी गहराई से जांच करेगा और यदि उसे विधिक रूप से लगेगा कि किसी समुदाय को शामिल किया जाना अनिवार्य है, तो वह नियमानुसार राज्य सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगा। सरकार का तर्क है कि पिछली व्यवस्था में आयोग की स्वायत्तता को दरकिनार किया गया था, जिसके चलते उच्च न्यायालय को पूरी आरक्षण प्रक्रिया को खारिज करने का सख्त कदम उठाना पड़ा था।
विधिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से मजबूत किए गए इस नए कानून के तहत अब राज्य सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग के साथ व्यापक विचार-विमर्श करने के बाद अलग-अलग ओबीसी श्रेणियों के लिए आनुपातिक आरक्षण प्रतिशत स्वतंत्र रूप से निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार मिल गया है। इसके साथ ही, दूसरे महत्वपूर्ण विधेयक के माध्यम से पिछड़ा वर्ग आयोग की आंतरिक संरचना, उसके न्यायिक अधिकारों और प्रशासनिक उत्तरदायित्वों को पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और पारदर्शी बना दिया गया है। हालांकि, सदन के भीतर इस सरकारी कदम का पुरजोर विरोध भी देखने को मिला। आईएसएफ (ISF) विधायक नवशाद सिद्दीकी ने सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया कि इस नए संशोधन की आड़ में एक खास समुदाय को सामाजिक और राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि चाहे हिंदू हो, ईसाई हो या कोई अन्य वर्ग, सभी जातियों का एक व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से सर्वे होना चाहिए। विपक्ष ने देश की शीर्ष अदालत के उन ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया जो यह स्पष्ट करते हैं कि आरक्षण सीमा में किसी भी प्रकार के बड़े फेरबदल के लिए ठोस अनुभवजन्य आंकड़े या वैज्ञानिक आकलन अनिवार्य हैं, जिसकी कमी इस वर्तमान विधेयक में साफ झलकती है।
विधानसभा से इन दोनों विधेयकों का पारित होना पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था और भविष्य की नियुक्तियों के लिहाज से एक नए युग की शुरुआत है। 17 प्रतिशत के कोटे को घटाकर 7 प्रतिशत करने का यह विधायी फैसला आने वाले समय में न केवल न्यायिक कसौटियों पर परखा जाएगा, बल्कि राज्य की चुनावी राजनीति में भी एक बेहद संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरेगा। सरकार जहां इसे उच्च न्यायालय के आदेशों के तहत एक अनिवार्य विधिक सुधार के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष और विभिन्न सामाजिक संगठन इसे समाज के एक बड़े हिस्से के अधिकारों में कटौती के रूप में देख रहे हैं। इस ऐतिहासिक विधायी बदलाव का वास्तविक और जमीनी प्रभाव आने वाले दिनों में सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों और शैक्षणिक संस्थानों के दाखिलों में साफ तौर पर परिलक्षित होगा।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
