बंगाल चुनाव से ठीक पहले ममता दीदी को मिला झटका; जानिए जहांगीर खान ने आखिर क्यों किया चुनाव लड़ने से इंकार?
निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित दोबारा मतदान से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान ने कानूनी मामलों और प्रशासनिक दबाव के बीच मैदान छोड़ दिया.

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के अंतर्गत आने वाले फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में चुनावी सरगर्मी और बदले राजनीतिक घटनाक्रम को प्रदर्शित करता राजनीतिक दृश्य.
West Bengal political twist 2026 : पश्चिम बंगाल की सियासत में विधानसभा उपचुनाव के मतदान से महज दो दिन पहले एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित उलटफेर सामने आया है. राज्य की हाई-प्रोफाइल फाल्टा विधानसभा सीट पर होने वाली री-वोटिंग से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ने अचानक चुनाव मैदान से हटने का फैसला कर लिया है. चुनावी रैलियों में फिल्म 'पुष्पा' का प्रसिद्ध संवाद "झुकेगा नहीं साला" बोलकर सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरने वाले टीएमसी नेता के इस आत्मसमर्पण ने राजनीतिक पंडितों और खुद सत्तारूढ़ दल को अचंभे में डाल दिया है. 21 मई को होने वाले मतदान से ऐन वक्त पहले उम्मीदवार द्वारा नाम वापस लिए जाने को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक व राजनीतिक झटका माना जा रहा है.
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम की कड़ियाँ राज्य के बदलते प्रशासनिक और कानूनी समीकरणों से जुड़ी हुई हैं. चुनाव प्रचार के दौरान अपने आक्रामक तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले जहांगीर खान ने यह कदम मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा दी गई एक कड़ी चेतावनी के बाद उठाया है. मुख्यमंत्री अधिकारी ने हाल ही में एक जनसभा में सार्वजनिक रूप से कहा था कि फाल्टा के इस पूरे मामले को वह व्यक्तिगत रूप से देख रहे हैं और 'पुष्पा' अब उनकी सीधी जिम्मेदारी है. इस कड़े रुख के बाद अचानक जहांगीर खान के सुर ढीले पड़ गए और उन्होंने चुनाव मैदान छोड़ने के साथ ही कानूनी राहत के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया, जिसने बंगाल की चुनावी बिसात पर सत्ता पक्ष को पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है.
इस मामले के कानूनी पहलुओं पर नजर डालें तो जहांगीर खान ने कलकत्ता हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर बंगाल पुलिस की दमनकारी और दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा की गुहार लगाई थी. अदालत में टीएमसी नेता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ राजनीतिक द्वेष के तहत लगातार एक के बाद एक नए आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं ताकि उन्हें चुनाव प्रक्रिया से दूर रखा जा सके. याचिका में मांग की गई थी कि पुलिस को उनके खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकियों (FIR) का ब्योरा सार्वजनिक करने का निर्देश दिया जाए. हालांकि, इन कानूनी दांव-पेंचों के बीच पुलिसिया कार्रवाई के बढ़ते दबाव और मुख्यमंत्री के कड़े बयानों के चलते जहांगीर खान ने चुनाव लड़ने के विचार को ही त्याग देना बेहतर समझा, जिसकी वजह से अब सोशल मीडिया पर भी उनके पुराने बयानों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं और ट्रोलिंग देखने को मिल रही है.
गौरतलब है कि फाल्टा विधानसभा सीट पर सामान्य चुनाव के दूसरे चरण के तहत 29 अप्रैल को मतदान संपन्न हुआ था. उस दौरान भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने ईवीएम मशीनों में पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के बगल वाले बटन पर सफेद टेप चिपकाए जाने की गंभीर शिकायत दर्ज कराई थी. बड़े पैमाने पर हुई इस चुनावी धांधली की गंभीरता को देखते हुए विशेष चुनाव पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता ने खुद प्रभावित मतदान केंद्रों का दौरा किया था. उनकी विस्तृत और संवेदनशील जांच रिपोर्ट के आधार पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पूरे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में पूर्व में हुए मतदान को रद्द करते हुए 21 मई को दोबारा वोटिंग कराने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया. अब टीएमसी उम्मीदवार के मैदान से हटने के बाद इस सीट के सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं, जिसके नतीजे 24 मई को घोषित किए जाएंगे. यह घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि बंगाल के चुनावी समर में प्रशासनिक शुचिता और कड़े नीतिगत फैसलों ने राजनीतिक दलों की पुरानी रणनीतियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है.

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
