कुछ इस तरह छीना गया था भारत से 'कोह-ए-नूर' हीरा ; जानें करनाल युद्ध के हार की असली कीमत
24 फरवरी 1739 को करनाल के युद्ध में नादिर शाह ने मुगल सम्राट मोहम्मद शाह को तीन घंटे में पराजित कर दिल्ली का मार्ग प्रशस्त किया। इस निर्णायक संघर्ष ने मुगल साम्राज्य को गहरा आघात पहुँचाया, जिसके बाद दिल्ली में नरसंहार और ऐतिहासिक लूट हुई।

करनाल का युद्ध 1739
24 फरवरी 1739 की सुबह उत्तर भारत की धरती पर ऐसा अध्याय लिखा गया जिसने न केवल एक साम्राज्य की शक्ति को चूर-चूर कर दिया, बल्कि भारतीय इतिहास की दिशा भी बदल दी। हरियाणा के करनाल के मैदान में फारस के शासक नादेर शाह और मुगल सम्राट मुहम्मद शाह की सेनाएँ आमने-सामने थीं। परिणाम मात्र तीन घंटों में स्पष्ट हो गया मुगल साम्राज्य की सैन्य प्रतिष्ठा ध्वस्त हो चुकी थी और दिल्ली पर आने वाला तूफान अब अटल था।
आक्रमण की भूमिका: दिल्ली दरबार की चूक
नादिर शाह, जो ईरान में अफशारिद वंश का संस्थापक था, पहले ही अफगान क्षेत्रों पर अधिकार कर अपनी सैन्य प्रतिभा सिद्ध कर चुका था। जून 1738 में काबुल के पतन का समाचार दिल्ली पहुँचा, किंतु मुगल दरबार ने महीनों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। नवंबर में जब नादिर शाह ने खैबर दर्रे को पार कर भारतीय सीमा में प्रवेश किया, तब भी निर्णायक सैन्य तैयारी में विलंब हुआ।
2 दिसंबर 1738 को सम्राट ने अपने प्रमुख अमीरों इतमाद-उद-दौला, वज़ीर क़मर-उद-दीन खान, निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह प्रथम तथा सैन्य प्रमुख खान दौरण को आक्रमण का सामना करने की अनुमति दी और धन भी प्रदान किया। परंतु सेना ने दिल्ली से बाहर शालीमार बाग में डेरा डालकर समय गंवाया। 10 जनवरी 1739 को जब सूचना मिली कि नादिर शाह अटक नदी पार कर चुका है, तब जाकर हरकत हुई, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
करनाल, दिल्ली और लाहौर के बीच प्राचीन मार्ग पर स्थित था। उत्तर में पानीपत और दक्षिण में तरावड़ी जैसे ऐतिहासिक युद्धस्थलों की निकटता ने इसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया था। पास ही कुरुक्षेत्र की भूमि थी, जो पौराणिक महाभारत युद्ध की स्मृतियाँ संजोए हुए है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में 1739 का निर्णायक संघर्ष घटित हुआ।
सेनाओं का आमना-सामना:
मुगल सेना संख्या में विशाल थी अनुमानतः 1 लाख से 3 लाख सैनिक परंतु संगठन और नेतृत्व में कमी स्पष्ट थी। दूसरी ओर नादिर शाह के पास लगभग 55 से 60 हजार प्रशिक्षित, अनुशासित और युद्धकुशल सैनिक थे। 13 फरवरी 1739 की सुबह (ग्रेगोरियन गणना के अनुसार 24 फरवरी) फारसी सेना तीन भागों में आगे बढ़ी। नादिर शाह ने अपनी टुकड़ियों को सुनियोजित ढंग से जमुना नदी और नहर के बीच विस्तृत मैदान में तैनात किया। उसका पुत्र नसरुल्लाह भी युद्ध में सम्मिलित था। इसी बीच अवध के सूबेदार सआदत खान 20,000 घुड़सवारों के साथ थकान से चूर अवस्था में करनाल पहुँचे। उनका रसद और सामान पीछे छूट गया था जो मुगल सैन्य व्यवस्था की कमजोरी का प्रतीक था। जब मुगल सैनिक अचानक मोर्चे से बाहर निकले, तब तक फारसी सेना रणनीतिक बढ़त ले चुकी थी।
युद्ध आरंभ होते ही फारसी तोपखाने और घुड़सवारों ने संगठित आक्रमण किया। मुगल सरदारों में समन्वय का अभाव था; कई इकाइयाँ स्वतंत्र रूप से लड़ीं। परिणामस्वरूप मुगल सेना शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गई। सआदत खान को बंदी बना लिया गया और सम्राट की स्थिति असहाय हो गई। समकालीन स्रोतों के अनुसार मुगलों की क्षति 10,000 से 30,000 सैनिकों तक आँकी गई, जबकि फारसी हताहत अपेक्षाकृत कम थे। स्वयं नादिर शाह ने दावा किया कि उसकी सेना ने 20,000 मुगलों का संहार किया और अनेक को बंदी बनाया।
दिल्ली की ओर बढ़ता तूफान:
करनाल की पराजय के बाद दिल्ली के द्वार खुल गए। मार्च 1739 में नादिर शाह विजेता के रूप में राजधानी में प्रवेश किया। शहर में तनाव और विद्रोह की घटनाओं के बाद भीषण नरसंहार हुआ। हजारों नागरिक मारे गए।
फारसी सेना अपार संपत्ति लेकर लौटी, जिनमें शामिल थे:
- प्रसिद्ध मयूर सिंहासन
- कोह-ए-नूर हीरा
- मुगल खजाने की विशाल संपदा
दिल्ली की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि को गहरा आघात पहुँचा।
ऐतिहासिक प्रभाव और परिणाम:
करनाल का युद्ध केवल एक सैन्य पराजय नहीं था; यह मुगल साम्राज्य के पतन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। पहले से कमजोर हो चुका शाही तंत्र इस आघात से उबर नहीं सका। उत्तर भारत में राजनीतिक विखंडन तेज हुआ, प्रांतीय शक्तियाँ उभरीं और आगे चलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रभाव विस्तार का अवसर मिला। नादिर शाह के लिए यह विजय उसके सैन्य जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि मानी गई रणनीति, गति और अनुशासन का अद्वितीय उदाहरण।
करनाल का युद्ध भारतीय इतिहास में उस क्षण का प्रतीक है जब एक विशाल साम्राज्य की नींव हिल गई। तीन घंटों की लड़ाई ने सदियों की सत्ता को झुका दिया और दिल्ली को ऐसे विध्वंस का साक्षी बनाया जिसकी गूँज लंबे समय तक सुनाई देती रही। यह संघर्ष केवल दो शासकों के बीच युद्ध नहीं था, बल्कि एक युग के अंत और नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत था।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
