सत्रहवीं शताब्दी का दक्कन राजनीतिक उथल-पुथल, बदलती निष्ठाओं और साम्राज्यवादी संघर्षों का केंद्र था। इसी अशांत परिवेश में एक ऐसा व्यक्तित्व उभरा जिसने न केवल अपने समय की सत्ता संरचनाओं को चुनौती दी, बल्कि “हिंदवी स्वराज” की अवधारणा को साकार रूप भी दिया। वह व्यक्तित्व था—छत्रपति शिवाजी महाराज, जिनका जन्म शिवनेरी किले की गोद में हुआ और जिन्होंने रायगढ़ से स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की घोषणा कर इतिहास की दिशा बदल दी।

जन्म, परिवार और प्रारंभिक पृष्ठभूमि:

शिवाजी का जन्म पुणे जिले के जुन्नर के निकट स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ। उनके जन्म की तिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, किंतु महाराष्ट्र सरकार 19 फरवरी को शिवाजी जयंती के रूप में मनाती है। उनका नाम स्थानीय देवी शिवाई के नाम पर रखा गया था। वे भोसले कुल के मराठा परिवार से थे। उनके पिता शाहाजी भोसले दक्कन के सुल्तानों के अधीन एक प्रभावशाली सेनानायक थे, जिन्होंने समय-समय पर अहमदनगर, बीजापुर और मुगलों के प्रति अपनी निष्ठा बदली, किंतु पुणे की अपनी जागीर और निजी सेना को सुरक्षित रखा।

शिवनेरी किल्ला


उनकी माता जिजाबाई, सिंधखेड़ के मुगल-संबद्ध सरदार लखुजी जाधव की पुत्री थीं, जिनका वंश देवगिरी के यादव शासकों से जोड़ा जाता है। शिवाजी के पितामह मालोजी भोसले अहमदनगर सल्तनत के प्रभावशाली सेनापति थे, जिन्हें “राजा” की उपाधि और पुणे, सुपे, चाकन व इंदापुर की देशमुखी अधिकार प्राप्त हुए। शिवनेरी दुर्ग भी उनके परिवार के निवास हेतु प्रदान किया गया था।


दक्कन की राजनीति और शिवाजी का उदय:

शिवाजी के जन्म के समय दक्कन की सत्ता तीन प्रमुख इस्लामी सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा के बीच विभाजित थी, जबकि उत्तर में मुगल साम्राज्य अपनी सीमाएँ विस्तार दे रहा था। ऐसे परिदृश्य में शाहाजी की बदलती निष्ठाओं के बीच शिवाजी ने राजनीतिक परिस्थितियों को गहराई से समझा। सिर्फ 16 वर्ष की आयु में, 1647 में, शिवाजी ने बीजापुर दरबार की अव्यवस्था का लाभ उठाकर तोरणा किले पर अधिकार कर लिया।

गोलकोंडा किल्ला


कहा जाता है कि यह विजय रणनीति और कूटनीति के माध्यम से संभव हुई। किले में प्राप्त विशाल खजाने ने उनकी महत्वाकांक्षाओं को बल दिया। अगले दो वर्षों में उन्होंने पुरंदर, कोंढाणा और चाकन जैसे महत्वपूर्ण दुर्गों पर अधिकार स्थापित किया। सुपा, बारामती और इंदापुर के क्षेत्रों को भी सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया। तोरणा से प्राप्त धन से उन्होंने राजगढ़ नामक नए किले का निर्माण कराया, जो एक दशक से अधिक समय तक उनके शासन का केंद्र बना रहा। यह वह चरण था जब शिवाजी ने स्वतंत्र सेनानायक के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।


संघर्ष और विस्तार:

शिवाजी का राजनीतिक जीवन अनेक संघर्षों से भरा रहा।

  • बीजापुर के सेनापति अफ़ज़ल खान के साथ उनका ऐतिहासिक मुकाबला मराठा इतिहास का निर्णायक अध्याय बना।
  • पन्हाला किले की घेराबंदी ने उनकी सैन्य रणनीति और धैर्य की परीक्षा ली।
  • मुगलों के साथ उनका टकराव, विशेषकर औरंगजेब के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव, दक्कन की राजनीति को नई दिशा देने वाला सिद्ध हुआ।

एक समय शिवाजी ने औरंगजेब को बीजापुर पर आक्रमण में सहयोग का प्रस्ताव भी दिया। किंतु उत्तराधिकार युद्ध के कारण औरंगजेब के उत्तर लौटते ही शिवाजी ने मुगलों के नाम पर बीजापुर द्वारा छोड़े गए क्षेत्रों पर स्वयं अधिकार कर लिया। यह उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता और अवसर की पहचान का प्रमाण था।

शिवजी महाराज और अफ़ज़ल खान


स्वराज की औपचारिक स्थापना:

लगातार सैन्य सफलताओं के बावजूद शिवाजी के पास कोई औपचारिक शाही उपाधि नहीं थी। वे तकनीकी रूप से या तो मुगल जमींदार माने जाते थे या बीजापुर के जागीरदार के पुत्र। ऐसी स्थिति में उनके शासन की वैधानिकता पर प्रश्न उठ सकते थे, विशेषकर अन्य मराठा सरदारों के समक्ष। इसलिए एक औपचारिक राज्याभिषेक आवश्यक था जो उन्हें न केवल कानूनी मान्यता दे, बल्कि मराठा समाज को एक स्वतंत्र हिंदू शासक प्रदान करे।

6 जून 1674 को रायगढ़ किले में भव्य समारोह के बीच शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ। हिंदू पंचांग के अनुसार यह ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, संवत 1596 का दिन था। काशी के विद्वान गागा भट्ट ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सात पवित्र नदियों यमुना, सिंधु, गंगा, गोदावरी, नर्मदा, कृष्णा और कावेरी के जल से उनका अभिषेक किया। राज्याभिषेक के पश्चात शिवाजी ने अपनी माता जिजाबाई के चरण स्पर्श किए। रायगढ़ में लगभग पचास हजार लोगों की उपस्थिति ने इस समारोह को ऐतिहासिक आयाम दिया। इस दिन वे औपचारिक रूप से “छत्रपति” की उपाधि से विभूषित हुए और मराठा साम्राज्य की स्थापना की घोषणा हुई।


छत्रपति शिवाजी महाराज का उदय केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के उत्थान की कहानी नहीं है, बल्कि वह स्वशासन, रणनीतिक कौशल और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। दक्कन की जटिल राजनीति के बीच उन्होंने जिस प्रकार स्वतंत्र सत्ता स्थापित की, उसने भारतीय उपमहाद्वीप की शक्ति-संतुलन को स्थायी रूप से प्रभावित किया। रायगढ़ की वह तिथि केवल एक राज्याभिषेक नहीं थी, बल्कि स्वराज की अवधारणा को मूर्त रूप देने का ऐतिहासिक क्षण था जिसने आने वाले समय में मराठा साम्राज्य को उपमहाद्वीप की प्रमुख शक्ति बना दिया।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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