सिर्फ डिलीवरी नहीं, देश की धड़कन हैं ये हाथ! गिग वर्कर्स की चुनौतियों पर सरकार का प्रहार, शुरू हुआ हक और रोज़गार का नया अध्याय।
भारत में गिग वर्कर्स की स्थिति और सुरक्षा को लेकर नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों ने चिंता जताई। ओला-उबर ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर और फ्रीलांसरों के लिए सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और कानूनी संरक्षण पर चर्चा जारी है। सरकार सुधारात्मक कदम उठा रही है।

नई दिल्ली, 3 जनवरी 2026 — देश में गिग वर्कर्स के बढ़ते स्वरूप और उनकी आर्थिक परिस्थितियों को लेकर हाल ही में नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ऐप आधारित कामकाज के बढ़ते चलन के साथ गिग अर्थव्यवस्था तेजी से उभर रही है, लेकिन इसके साथ ही इस श्रमिक वर्ग की सामाजिक सुरक्षा, वेतन संरचना और कार्य परिस्थितियों को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं।
गिग वर्कर्स, जिन्हें आम भाषा में फ्रीलांस या डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अस्थायी कार्य करने वाले लोग कहा जाता है, जैसे कि ओला-उबर ड्राइवर, Swiggy और Zomato डिलीवरी पार्टनर, फ्रीलांस डिज़ाइनर और कंटेंट क्रिएटर, भारत में रोजगार का नया स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं। हाल ही में आयोजित गिग वर्कर्स पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में श्रम और रोजगार मंत्रालय के अधिकारी, उद्योग विशेषज्ञ और प्लेटफॉर्म संचालक शामिल हुए।
संगोष्ठी में प्रमुख बिंदु यह रहे कि गिग वर्कर्स के पास पारंपरिक कर्मचारियों जैसी सुरक्षा नहीं है। श्री प्रद्युम्न जैन, श्रम एवं रोजगार विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “गिग वर्कर्स हमारे देश की नई अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनके लिए सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं की कमी एक बड़ा संकट बनती जा रही है।”
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाले करोड़ों लोग नियमित वेतन, छुट्टियां, पेंशन या बीमा जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। इसके परिणामस्वरूप इन कर्मचारियों की जीवनशैली असुरक्षित हो जाती है और आर्थिक अस्थिरता के प्रभाव तेजी से बढ़ते हैं।
संगोष्ठी में यह भी चर्चा हुई कि डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालक इस श्रमिक वर्ग की समस्याओं को समझते हुए नई नीतियों के माध्यम से सुधार ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, Uber और Ola जैसे प्लेटफॉर्म ने ड्राइवरों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस, फ्यूल सब्सिडी और बोनस जैसी योजनाओं की शुरुआत की है, लेकिन यह सुविधा पूरे गिग वर्क फोर्स तक नहीं पहुंच पाती।
राजनीतिक दृष्टि से भी गिग वर्कर्स का मुद्दा प्रमुख बनता जा रहा है। विपक्षी दलों और श्रमिक संगठनों ने सरकार से आग्रह किया है कि वे इस श्रमिक वर्ग के लिए क़ानूनी ढांचे और न्यूनतम वेतन मानक तय करें। सुरेश गुप्ता, एक श्रमिक संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि “गिग वर्कर्स के लिए कानूनी सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली लागू करना समय की आवश्यकता है। यदि इसे नजरअंदाज किया गया, तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालीन चुनौती बन सकती है।”
सरकार ने भी संकेत दिए हैं कि वह गिग वर्कर्स के लिए विशेष श्रमिक पहचान कार्ड, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन स्कीम पर काम कर रही है। इसके साथ ही श्रम मंत्रालय ने गिग वर्कर्स की संख्या और आर्थिक योगदान का डेटा जुटाने के लिए विभिन्न राज्यों में सर्वेक्षण अभियान शुरू किए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल और गिग अर्थव्यवस्था भारत के युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा स्रोत बन सकती है, लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि श्रमिकों के लिए सुरक्षा, स्थायित्व और कानूनी संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। गिग वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा और उनके कामकाजी परिस्थितियों में सुधार ही इस श्रमिक वर्ग को सशक्त बना सकता है।
इस प्रकार, भारत में गिग अर्थव्यवस्था का विस्तार न केवल रोजगार के नए अवसर प्रस्तुत करता है, बल्कि इसके साथ जुड़े सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता भी दर्शाता है। नीति निर्माताओं और प्लेटफॉर्म संचालकों के सहयोग से गिग वर्कर्स की स्थिति में सुधार आने की उम्मीद जताई जा रही है।

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