नए साल के आगमन के साथ ही भारत की वित्तीय तस्वीर में एक महत्वपूर्ण मोड़ सामने आया है। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) नवंबर 2025 के अंत तक अपने वार्षिक लक्ष्य का 62.3 प्रतिशत पार कर गया है, जिससे आर्थिक प्रबंधन और बजट नीति पर नई बहस छिड़ गई है। यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2025–26 के लिए निर्धारित बजट अनुमान के अनुसार है, जिसका पूर्ण वर्ष लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.4 प्रतिशत रखा गया था और इसे राशि में लगभग ₹15.69 लाख करोड़ का लक्ष्य दिया गया था। लेकिन केंद्रीय अकाउंट्स विभाग द्वारा जारी नवीनतम डेटा से यह स्पष्ट हुआ है कि अप्रैल से नवंबर तक राजकोषीय घाटा ₹9.76 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है।


राजकोषीय घाटा वह अंतर है जो सरकार के खर्च और राजस्व (करों व गैर-कर प्राप्तियों को मिलाकर) के बीच मौजूद होता है। इसका बढ़ना संकेत है कि सरकार ने खर्चों को राजस्व वृद्धि के मुकाबले अधिक गति से बढ़ाया है। Controller and Auditor General (CAG) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, कुल मिलाकर ₹19.49 लाख करोड़ की आय प्राप्त हुई जो कुल अनुमान का लगभग 55.7 प्रतिशत है, जबकि कुल व्यय ₹29.26 लाख करोड़ यानी 57.8 प्रतिशत के स्तर पर रहा। इसमें ₹22.67 लाख करोड़ का खर्च सिर्फ राजस्व हिस्से पर किया गया और ₹6.58 लाख करोड़ पूंजीगत व्यय के लिए आवंटित हुआ।


अकाउंट्स विभाग के आंकड़ों में यह भी सामने आया है कि कर राजस्व (टैक्स रेवेन्यू) में अपेक्षित वृद्धि नहीं देखी गई है। कुल कर राजस्व ₹13,93,946 करोड़ रहा, जो सरकार के अनुमान के अनुरूप नहीं है। साथ ही ₹5,16,366 करोड़ गैर-कर राजस्व प्राप्त हुआ, जबकि ₹38,927 करोड़ गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियाँ दर्ज की गईं। इसके अलावा, केंद्र ने ₹9,36,561 करोड़ राज्यों को कर हिस्सेदारी के रूप में हस्तांतरित किए, जो पिछले वर्ष की तुलना में ₹1,24,498 करोड़ अधिक रहा।


अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि राजकोषीय घाटे में तेजी से बढ़ोतरी का कारण पूंजीगत व्यय में वृद्धि, मंद कर संग्रह और सामान्य व्यय में सतत लिप्तता है। ICRA की प्रमुख अर्थशास्त्री Aditi Nayar ने कहा कि अगले कुछ महीनों में कर संग्रह में सुधार और गैर-कर राजस्व में वृद्धि घाटे के संभावित दुष्प्रभाव को कम कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि फिलहाल राजकोषीय गिरावट की आशंका नहीं है, बशर्ते सरकार व्यय प्रबंधन में सुधार लाए।


राजकोषीय घाटे का स्तर वित्तीय अनुशासन का एक महत्वपूर्ण संकेतक होता है और इसे नियंत्रित रखना नीतिगत प्राथमिकताओं में शामिल है। बजट 2025–26 की घोषणा करते समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घाटे को GDP के 4.4% पर रोकने का लक्ष्य रखा था, जिसे मौजूदा स्तरों से पूरा करना एक चुनौती भी माना जा रहा है। इससे पहले पिछले वित्त वर्ष में राजकोषीय लक्ष्य 4.8% था, जिसे सरकार ने सफलतापूर्वक प्रबंधित किया था।


राजकोषीय आंकड़ों के इस बदलाव का सीधा असर सरकारी नीतियों, विकास खर्च, कर योजना और आर्थिक विकास दर पर पड़ता है। सार्वजनिक खर्च में तेजी से वृद्धि का उद्देश्य मूलभूत ढांचे, विकास परियोजनाओं और रोजगार सृजन कार्यक्रमों को गति देना है, लेकिन ऐसी स्थिति में राजस्व वृद्धि का दबाव भी बढ़ता है। इसके परिणामस्वरूप सरकार को बाजार से उधार लेने की आवश्यकता बढ़ जाती है, जिससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।

आर्थिक वास्तविकताओं और सरकारी रिपोर्टों के बीच की खाई पर नजर रखते हुए यह स्पष्ट है कि वित्त वर्ष 2025–26 के अंतिम तीन महीनों में राजकोषीय नियंत्रण और राजस्व संग्रह दोनों पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक होगा। इससे न केवल बजट लक्ष्य पूरा किया जा सकेगा, बल्कि अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक मजबूती सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी।

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