वन्दे मातरम् के पुरे लिरिक्स जिसके शब्द शब्द में छिपी है भारत माता की शक्ति, इस 26 जनवरी पर जानिए राष्ट्रीय गीत का स्वर्णिम इतिहास
'वन्दे मातरम्' केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महामंत्र है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस राष्ट्रगीत का पूर्ण पाठ भारत की प्राकृतिक सुषमा और अदम्य शक्ति का सजीव चित्रण करता है। इस विशेष लेख में पढ़ें वन्दे मातरम् का अर्थ, इसका इतिहास और संविधान में इसे मिले 'राष्ट्रीय गीत' के दर्जे की पूरी कहानी। जानें कैसे इसने करोड़ों भारतीयों को एक सूत्र में पिरोया।

वन्दे मातरम् — पूरा पाठ
वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यशामलाम् मातरम्।
वन्दे मातरम्।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम्।
वन्दे मातरम्।
कोटि-कण्टे पृथिवी-सीमान्त-स्थलीम्,
उपस्थित-वीणा-वाती-शरण्यां,
शैलशिखरिणी-हिमकान्त-शोभिनीम्,
विश्रुत-शिल्प-कलाशालिनीम्,
खङ्ग-शोभ-पङ्क्त-शोभिनीम्,
मनोहरकरनीं मातरम्।
'वन्दे मातरम्' का पूर्ण पाठ भारत माता के जिस स्वरूप का वर्णन करता है, वह अत्यंत ही मनोहारी और संवेदनाओं से परिपूर्ण है। गीत की शुरुआती पंक्तियां— "सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्"— भारत की भौगोलिक समृद्धि का बखान करती हैं। यह उस भूमि का वंदन है जो जल से परिपूर्ण है, फलों से लदी है और जहाँ मलय पर्वत से आने वाली शीतल हवाएं बहती हैं।
गीत के अगले हिस्से में बंकिम बाबू लिखते हैं, "शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्", अर्थात वह भूमि जिसकी रातें चांदनी से खिली रहती हैं और जिसके वृक्ष खिले हुए फूलों से सुशोभित हैं। यह वर्णन पाठकों और श्रोताओं के समक्ष भारत की प्राकृतिक सुंदरता का एक सजीव चित्र खींच देता है, जो सुख प्रदान करने वाली (सुखदां) और वरदान देने वाली (वरदां) माँ के समान है।
अक्सर सार्वजनिक मंचों पर इस गीत का संक्षिप्त रूप ही सुना जाता है, लेकिन इसके पूर्ण पाठ में छिपा वीर रस अत्यंत गहरा है। "कोटि-कण्टे पृथिवी-सीमान्त-स्थलीम्" जैसी पंक्तियां उस समय की वास्तविकता को दर्शाती हैं जब करोड़ों कंठ एक साथ माँ की जयकार कर रहे थे।
गीत में भारत माता को केवल कोमल ही नहीं, बल्कि शक्ति का प्रतीक भी बताया गया है। "खङ्ग-शोभ-पङ्क्त-शोभिनीम्" (हाथों में तलवार धारण किए हुए) का वर्णन, देवी दुर्गा और राष्ट्र शक्ति के अद्भुत समन्वय को दर्शाता है। यह वही स्वरूप था जिसने क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे पर झूलते हुए भी मुस्कुराने का साहस दिया।
संवैधानिक दर्जा और ऐतिहासिक महत्त्व
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, इस गीत की ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए इसे विशेष संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
- संवैधानिक मान्यता: 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'वन्दे मातरम्' को 'जन गण मन' के समान ही दर्जा देते हुए इसे भारत का 'राष्ट्रीय गीत' (National Song) घोषित किया।
- ऐतिहासिक संदर्भ: यह गीत 1882 में बंकिम चंद्र के उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित हुआ था और 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गाया गया था।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
