एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव डालने वाले निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कार्यों को लेकर दशकों से चली आ रही कानूनी और सामाजिक धारणा को नई दिशा दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले बिना वेतन घरेलू कार्य को अब आर्थिक रूप से मूल्यांकित किया जाना चाहिए और इसे कमतर या शून्य योगदान मानना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि गृहिणियाँ वास्तव में “राष्ट्र निर्माता” हैं, जिनका योगदान परिवार और समाज की नींव को मजबूत करता है।

यह फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें पंजाब की एक महिला रेशमा की वर्ष 2001 में सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनकी मृत्यु के बाद पति और तीन बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के समक्ष मुआवजे की मांग की थी, जिसमें घरेलू योगदान के नुकसान को भी शामिल करने की बात कही गई थी। हालांकि 2003 में अधिकरण द्वारा निर्णय दिए जाने के बाद भी यह मामला विभिन्न स्तरों पर लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरता रहा और अंततः दिसंबर 2024 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस अपील का निपटारा किया, यानी दुर्घटना के दो दशकों से अधिक समय बाद यह विवाद समाप्त हुआ।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने की। अदालत ने लंबे समय से चली आ रही उस न्यायिक परंपरा को अस्वीकार कर दिया जिसमें गृहिणियों की अनुमानित आय को कुशल श्रमिकों के वेतन के बराबर माना जाता था। न्यायालय ने कहा कि यह दृष्टिकोण घरेलू देखभाल कार्य के वास्तविक आर्थिक और सामाजिक मूल्य को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं करता।

अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि घरेलू कार्य किसी भी तरह से “निःशुल्क श्रम” नहीं है, बल्कि यह परिवार की स्थिरता, देखभाल और सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण आधार है। अदालत ने माना कि पिछले समय में न्यायालयों द्वारा गृहिणियों को “अर्निंग न करने वाली” श्रेणी में रखना या उन्हें न्यूनतम मजदूरी श्रमिकों के समकक्ष आंकना एक अपर्याप्त और असंतुलित दृष्टिकोण था, जिसे बदलना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में एक नया मानक निर्धारित करते हुए यह कहा कि अब मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में गृहिणियों के घरेलू कार्य का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह माना जाएगा। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी प्रकार का वेतन या सरकारी भुगतान नहीं है, बल्कि केवल एक “नॉटशनल वैल्यू” है जिसका उपयोग कानूनी मुआवजा गणना के लिए किया जाएगा।

इस निर्णय ने यह स्थापित किया है कि भविष्य में अदालतें गृहिणियों के कार्य को वित्तीय दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए अधिक न्यायसंगत मुआवजा तय करेंगी, जिससे लंबे समय से अनदेखी की जा रही घरेलू श्रम की वास्तविक कीमत को कानूनी मान्यता मिल सकेगी। यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में एक सशक्त कदम माना जा रहा है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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