West Bengal Election में 34 लाख लोग नहीं डाल पाएंगे वोट; सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश
बंगाल चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; 34 लाख मतदाताओं को वोट देने से फिलहाल इनकार। मतदाता सूची विवाद पर ममता सरकार को लगा करारा झटका।

नई दिल्ली स्थित भारत के उच्चतम न्यायालय का मुख्य भवन जहां पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सुनवाई की गई।
West Bengal Voter List Case 2026 : पश्चिम बंगाल की चुनावी चौखट पर खड़ी Mamata Banerjee सरकार को देश की शीर्ष अदालत से एक ऐसा झटका लगा है, जिसने राज्य के सियासी समीकरणों में भूचाल ला दिया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची से हटाए गए 34 लाख लोगों को फिलहाल लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में हिस्सा लेने से सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक इनकार कर दिया है। अदालत के इस फैसले ने न केवल विपक्षी दलों को हमलावर होने का मौका दे दिया है, बल्कि उन लाखों नागरिकों की उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है जो अपनी अपीलों के लंबित होने के बावजूद मतदान की उम्मीद लगाए बैठे थे।
सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में तर्क-वितर्क का जो सिलसिला चला, उसने चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन के बीच की तनातनी को भी उजागर किया। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि लगभग 16 लाख से अधिक अपीलें दायर की जा चुकी हैं और इन नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं होगा। हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक है और अपीलों की कुल संख्या 34 लाख के पार पहुँच चुकी है। याचिकाकर्ताओं का गंभीर आरोप था कि चुनाव आयोग ने बिना किसी ठोस आधार और उचित प्रक्रिया के इन नामों को सूची से बाहर का रास्ता दिखाया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस संवेदनशील मामले पर संवैधानिक व्यवस्था को सर्वोपरि रखते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया के इस अंतिम चरण में किसी भी प्रकार का अंतरिम हस्तक्षेप पूरी चुनावी मशीनरी को बाधित कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने याचिका को 'समय से पहले' करार देते हुए कहा कि वोटिंग अधिकारों को इस तरह निलंबित या बहाल करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे सीधे शीर्ष अदालत आने के बजाय पहले अपीलीय ट्रिब्यूनल का रुख करें। वर्तमान में राज्य के 27 लाख विवादित मामलों के निस्तारण के लिए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्य कर रहे हैं।
जस्टिस बागची ने सुनवाई के अंत में एक भावुक लेकिन कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा कि मतदान का अधिकार केवल एक संवैधानिक प्रावधान मात्र नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में नागरिक की भागीदारी का एक गहरा भावनात्मक प्रतीक भी है। फिर भी, अदालत ने यह साफ कर दिया कि ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली और कानूनी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर कोई भी आदेश नहीं दिया जा सकता। यह फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, क्योंकि 34 लाख मतदाताओं का मतदान प्रक्रिया से बाहर रहना किसी भी चुनावी परिणाम को पलटने की ताकत रखता है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ये ट्रिब्यूनल समय रहते इन नागरिकों के भाग्य का फैसला कर पाएंगे या फिर ये लाखों हाथ इस बार मतपेटी तक नहीं पहुँच पाएंगे।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
