SC strikes down Tribunal Reforms Act 2021 decision : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट 2021 के प्रमुख प्रावधानों को असंवैधानिक करार दे दिया। अदालत ने साफ कहा कि यह कानून न केवल शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने की कोशिश भी करता है। चीफ जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार के कदमों को “न्यायिक आदेशों की अवहेलना” बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई।

पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि जिन प्रावधानों को पहले कोर्ट ने रद्द किया था, उन्हें मामूली बदलावों के साथ दोबारा लागू करना न्यायपालिका के अधिकारों का अपमान है। फैसले में सीजेआई गवई ने लिखा कि बाध्यकारी फैसलों की अनदेखी कर कानून में वास्तविक सुधार नहीं किए गए, जिससे ट्रिब्यूनलों की नियुक्तियों, उनके कार्यकाल और कार्यप्रणाली पर गंभीर असर पड़ा है। अदालत ने यह कहते हुए असंतोष जाहिर किया कि कानून बनाते समय मद्रास बार एसोसिएशन (एमबीए) मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2020 से शुरू होती है, जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल अध्यक्ष और सदस्यों के कार्यकाल को पांच वर्ष तय किया था। हालांकि केंद्र सरकार ने 2021 में अध्यादेश के जरिए इस अवधि को घटाकर चार वर्ष कर दिया। कोर्ट ने जुलाई 2021 में इस अध्यादेश को रद्द कर दिया, लेकिन इसके बावजूद अगस्त 2021 में संसद ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल पास करते हुए वही प्रावधान फिर से शामिल कर दिए। इस कानून में कई निकायों को समाप्त किया गया और नियुक्तियों के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष तथा चार वर्ष का कार्यकाल अनिवार्य किया गया था।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था स्पष्ट करते हुए कहा कि नए कानून के पारित होने तक ट्रिब्यूनल्स में नियुक्तियां एमबीए-4 और एमबीए-5 मामलों में निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार ही होंगी। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आईटीएटी) सहित कई महत्वपूर्ण अधिकरणों पर पूर्व-2021 कानून लागू रहेंगे। अदालत ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन गठित करने का भी निर्देश दिया, जो ट्रिब्यूनलों की नियुक्तियों, प्रशासन और स्वतंत्र कार्यप्रणाली की निगरानी करेगा।

यह फैसला न सिर्फ विधायी ढांचे की खामियों को उजागर करता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि न्यायपालिका से जुड़े किसी भी संस्थागत ढांचे से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट की सख्त टिप्पणियां भविष्य में ऐसी विधायी पुनरावृत्तियों पर स्पष्ट रोक का संकेत देती हैं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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