भारत में भक्ति आंदोलन के महान संत और समाज सुधारक कबीर दास जी की जयंती, जिसे कबीर जयंती या कबीर प्राकट्य दिवस के नाम से भी जाना जाता है, हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह अवसर और भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि यह संत कबीर की 649वीं जयंती के रूप में मनाया जाएगा, जिसका आयोजन 29 जून 2026 को ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि के अनुसार निर्धारित किया गया है।

ऐतिहासिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार, कबीर जयंती का संबंध वर्ष 1398 ईस्वी में कबीर दास के जन्म से जोड़ा जाता है। हर वर्ष यह पर्व मई-जून के बीच आने वाली ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। बीते वर्षों में इसकी तिथियों में भी परिवर्तन देखने को मिला है, जैसे 2021 में 24 जून, 2022 में 14 जून और 2023 में 4 जून को कबीर जयंती मनाई गई थी, जो पंचांग गणना के आधार पर निर्धारित होती रही है।

कबीर दास के जन्म और उनके दिव्य प्राकट्य को लेकर विभिन्न मान्यताएँ प्रचलित हैं। कुछ परंपराओं में यह माना जाता है कि उनका जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था, जबकि कबीरपंथी परंपरा में यह विश्वास है कि संत कबीर का प्राकट्य काशी के लहरतारा तालाब में कमल के पुष्प पर दिव्य रूप में हुआ था। कहा जाता है कि इस दिव्य घटना के प्रत्यक्ष साक्षी ऋषि अष्टानंद थे।

कबीर जयंती के अवसर पर देशभर में कबीरपंथी अनुयायी और श्रद्धालु संत कबीर के उपदेशों का स्मरण करते हैं। इस दिन भजन-कीर्तन, प्रवचन और धार्मिक सभाओं का आयोजन किया जाता है। कई स्थानों पर भंडारों का आयोजन कर समाजसेवा के कार्य भी किए जाते हैं, जो कबीर के सामाजिक समरसता और मानवता के संदेश को आगे बढ़ाते हैं।

संत कबीर दास ने अपने दोहों के माध्यम से समाज को सरल, सच्चा और आत्मचिंतन का मार्ग दिखाया। उनके प्रसिद्ध दोहे निम्न प्रकार हैं:

“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥”

अर्थ: मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके ज्ञान और गुणों से होती है।


“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर॥”

अर्थ: केवल बाहरी साधना नहीं, बल्कि मन का परिवर्तन ही वास्तविक भक्ति है।


“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”

अर्थ: प्रेम और मानवता ही सच्चा ज्ञान है, केवल पुस्तक ज्ञान पर्याप्त नहीं।


“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥”

अर्थ: हर कार्य अपने समय पर ही सफल होता है, धैर्य आवश्यक है।

कबीर जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि सामाजिक समानता, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय मूल्यों को पुनः स्थापित करने का अवसर माना जाता है। उनके विचार आज भी समाज में व्याप्त कुरीतियों और भेदभाव के विरुद्ध एक मजबूत संदेश के रूप में जीवित हैं।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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