Saalumarada Thimmakka Died : वह सुबह थी जब कर्नाटक की धरती ने अपनी सबसे हरी बेटी को विदा कर दिया। पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरण योद्धा 'सालूमरदा' थिमक्का, जिन्होंने बंजर राजमार्ग को जंगल में बदल दिया और पेड़ों को अपनी संतान माना, 114 वर्ष की आयु में आज सुबह बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। लंबी बीमारी से जूझ रहीं थिमक्का को सितंबर में कमजोरी और भूख न लगने की शिकायत पर दो दिन अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई थी। लेकिन नियति ने उन्हें ज्यादा समय नहीं दिया। राज्य भर में शोक की लहर दौड़ गई, जहां मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से लेकर पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंड्रे तक ने उन्हें 'अमर पर्यावरण प्रहरी' करार दिया।


थिमक्का का जन्म 1911 में तुमकुरु जिले के गुब्बी तालुका के कुमकुरु गांव में हुआ था। निरक्षर मजदूर परिवार की बेटी, जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, बिक्कला चिक्कय्या से विवाह के बाद मगदी तालुका के हुलिकल गांव में बस गईं। संतानहीन दंपति के लिए जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा थी – कोई वारिस नहीं। लेकिन 1950 के दशक में, जब वे कुदुर से हुलिकल तक राज्य राजमार्ग 94 पर 4.5 किलोमीटर पैदल चलकर मजदूरी के लिए जाते थे, तभी चिक्कय्या के साथ मिलकर उन्होंने पहला बरगद का पौधा रोपा। वह बीज नहीं, बल्कि एक सपना था। धीरे-धीरे, इस दंपति ने उसी राजमार्ग के किनारे 385 बरगद के पेड़ लगाए – हर पेड़ को पानी पिलाया, घेरा बनाया, और उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला। आज वे पेड़ विशालकाय छांव देते हैं, जो थिमक्का की अमर विरासत हैं।


उनकी इस सादगी भरी क्रांति को देश ने सलाम किया। 2019 में सामाजिक कार्य-पर्यावरण श्रेणी में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। निरक्षर होने के बावजूद उन्हें कई विश्वविद्यालयों से मानद डॉक्टरेट की उपाधि मिली। कर्नाटक सरकार ने उन्हें 'सालूमरदा' की उपाधि दी, जिसका अर्थ है 'पंक्तिबद्ध पेड़ लगाने वाली'। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक्स पर लिखा, “हजारों पेड़ लगाने और उन्हें बच्चों की तरह पालने वाली थिमक्का ने अपना जीवन पर्यावरण संरक्षण को समर्पित किया। वे हमें छोड़ गईं, लेकिन उनका प्रेम उन्हें अमर बनाएगा। राज्य क्षीण हो गया।” पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंड्रे ने कहा, “वृक्ष माता थिमक्का ने पेड़ों को संतान मानकर हरियाली का संदेश फैलाया। पद्मश्री सहित सर्वोच्च सम्मान उनकी महानता का प्रमाण हैं।”


हुलिकल गांव में आज सन्नाटा पसरा है। जिन पेड़ों की छांव में थिमक्का दशकों तक बैठीं, वे आज भी खड़े हैं – गव Ah उनकी अनुपस्थिति की। चिक्कय्या का 1991 में निधन हो चुका था, लेकिन थिमक्का ने अकेले ही अपनी विरासत को जीवित रखा।


थिमक्का का जाना एक युग का अंत है। वह युग जब एक निरक्षर महिला ने बिना किसी सरकारी मदद के धरती को हरा कर दिया। उनके 385 बरगद आज भी राज्य राजमार्ग 94 पर खड़े हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को सिखाएंगे कि पर्यावरण संरक्षण कोई नीति नहीं, बल्कि जीवन का तरीका है। कर्नाटक ने अपनी 'वृक्षमाता' खो दी, लेकिन उ

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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