भारत में नकदी व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और आधुनिक बनाने की दिशा में भारतीय रिजर्व बैंक एक बार फिर बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। वर्षों से लंबित पड़े पॉलिमर यानी प्लास्टिक बैंक नोटों के प्रस्ताव को अब दोबारा सक्रिय किया जा रहा है। बढ़ती करेंसी प्रिंटिंग लागत, तेजी से खराब हो रहे नोटों की समस्या और नकदी की लगातार बढ़ती मांग ने आरबीआई को इस दिशा में गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, जल्द ही पॉलिमर नोटों के पायलट प्रोजेक्ट की औपचारिक घोषणा की जा सकती है।

देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था तेजी से बढ़ने के बावजूद नकदी की मांग लगातार ऊंचाई पर बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025 में भारत में चलन में मौजूद मुद्रा का कुल मूल्य 11.5 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 42.86 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया। इसी दौरान करेंसी छापने पर आरबीआई का खर्च भी तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024 में जहां करेंसी प्रिंटिंग पर 5,101.4 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।


इसके साथ ही खराब और गंदे नोटों की समस्या भी लगातार गंभीर होती जा रही है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में लगभग 23.8 अरब खराब और गंदे नोटों को चलन से हटाना पड़ा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12.3 प्रतिशत अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे अधिक नुकसान 500 रुपये और 100 रुपये के नोटों को होता है क्योंकि इनका उपयोग सबसे ज्यादा होता है। यही कारण है कि आरबीआई अब ऐसे विकल्पों पर ध्यान दे रहा है जो लंबे समय तक टिक सकें और बार-बार नोट बदलने की जरूरत को कम कर सकें।

पॉलिमर बैंक नोट साधारण कागज की जगह पॉलीप्रोपाइलीन नामक विशेष प्लास्टिक सामग्री से बनाए जाते हैं। ये नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक मजबूत, नमी और गंदगी से सुरक्षित तथा फटने से काफी हद तक बचाव करने वाले माने जाते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये लंबे समय तक खराब नहीं होते और साफ-सुथरे बने रहते हैं। माना जाता है कि पॉलिमर नोट सामान्य नोटों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक समय तक चल सकते हैं।

दुनिया के कई देशों ने पहले ही इस तकनीक को अपनाया हुआ है। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले वर्ष 1988 में पॉलिमर करेंसी शुरू की थी। इसके बाद कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों ने भी प्लास्टिक नोटों को अपने बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा बना लिया। इन देशों में पॉलिमर नोटों को बेहतर सुरक्षा फीचर्स और लंबी उम्र के कारण सफल माना गया है।

भारत में भी यह विचार नया नहीं है। वर्ष 2012 में यूपीए सरकार के दौरान पहली बार पॉलिमर नोटों को लेकर गंभीर पहल की गई थी। उस समय पांच शहरों में 10 रुपये के लगभग एक अरब पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी गई थी। उस परियोजना का मुख्य उद्देश्य नोटों की उम्र बढ़ाना था, न कि केवल नकली नोटों पर रोक लगाना। हालांकि तकनीकी चुनौतियों, एटीएम मशीनों की अनुकूलता और नोट हैंडलिंग सिस्टम से जुड़ी समस्याओं के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी और बाद में ठंडे बस्ते में चली गई।

अब स्थिति पहले से काफी बदल चुकी है। आरबीआई से जुड़े सूत्रों का कहना है कि देश में एटीएम नेटवर्क, करेंसी प्रोसेसिंग मशीनें और नोट हैंडलिंग तकनीक अब पॉलिमर नोटों के लिए तैयार हैं। इसी कारण इस परियोजना को दोबारा शुरू करने की संभावनाएं मजबूत हो गई हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, आरबीआई शुरुआत में 10 रुपये और 20 रुपये के पॉलिमर नोट जारी कर सकता है क्योंकि ये छोटे मूल्यवर्ग के नोट सबसे ज्यादा उपयोग में आते हैं और जल्दी खराब हो जाते हैं। यदि शुरुआती परीक्षण सफल रहता है, तो आगे चलकर अन्य मूल्यवर्गों में भी पॉलिमर नोट लाए जा सकते हैं।

पॉलिमर नोटों के कई फायदे बताए जा रहे हैं। ये नोट अधिक समय तक टिकते हैं, जिससे बार-बार नए नोट छापने की आवश्यकता कम होती है और लंबे समय में लागत घट सकती है। इन नोटों में पारदर्शी विंडो, विशेष होलोग्राम और उन्नत सुरक्षा फीचर्स जोड़ना आसान होता है, जिससे नकली नोटों पर नियंत्रण मजबूत किया जा सकता है। इसके अलावा ये नोट गंदगी और नमी कम सोखते हैं, इसलिए इन्हें अधिक स्वच्छ भी माना जाता है।

हालांकि इस योजना को लेकर कुछ चिंताएं भी सामने आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती स्तर पर पॉलिमर नोटों के उत्पादन की लागत अधिक हो सकती है। इसके अलावा प्लास्टिक आधारित सामग्री के पर्यावरणीय प्रभाव और पुराने नोटों के निस्तारण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नई बनावट वाले नोटों के प्रति आम जनता को अभ्यस्त होने में समय लग सकता है। फिर भी आरबीआई अधिकारियों का मानना है कि तकनीकी और संचालन संबंधी अधिकांश चुनौतियां अब काफी हद तक नियंत्रित की जा सकती हैं।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत की मुद्रा प्रबंधन नीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। 2000 रुपये के नोटों की वापसी, डिजिटल भुगतान के विस्तार के बावजूद नकदी की मजबूत मांग और करेंसी प्रबंधन पर बढ़ता खर्च अब आरबीआई को नई रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि पॉलिमर नोटों की यह नई पहल सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में भारत की करेंसी व्यवस्था में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल सकता है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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