27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर की धरती पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक ऐसे संगठन की नींव रखी थी, जिसने धीरे-धीरे भारतीय समाज और राजनीति के ताने-बाने में गहरी छाप छोड़ी। एक छोटे से विचार के बीज के रूप में बोया गया यह संगठन आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के रूप में विशाल वटवृक्ष बन चुका है। अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता और सांस्कृतिक चेतना के आधार पर संघ ने न केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई है। अब जब यह संगठन अपने शताब्दी वर्ष के समारोह की ओर बढ़ रहा है, तब इसके इतिहास, योगदान, विवाद और वर्तमान प्रभाव पर नई दृष्टि से विचार करना स्वाभाविक हो जाता है।

स्थापना से संघर्ष तक

आरएसएस की स्थापना के शुरुआती दिनों में इसे एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में देखा जाता था। शाखाओं में शारीरिक व्यायाम, खेल, वंदना और बौद्धिक चर्चाओं के माध्यम से अनुशासन और संगठन निर्माण पर जोर दिया जाता था। धीरे-धीरे यह संगठन सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक जागरूकता का केंद्र बनता गया।

संघ के कार्यकर्ताओं ने समाज के पिछड़े और दलित वर्गों तक पहुँच बनाने के लिए विशेष प्रयास किए। दलितों को मंदिरों में पुजारी बनने का प्रशिक्षण देना इसी सोच का हिस्सा था। महात्मा गांधी ने 1934 में संघ के एक शिविर का दौरा किया और वहाँ देखे गए अनुशासन और छुआछूत की अनुपस्थिति की सराहना की।

संगठनात्मक ढांचा और शाखाओं की भूमिका

संघ का सर्वोच्च पद "सरसंघचालक" कहलाता है, जो संगठन का मार्गदर्शन करता है। परंपरागत रूप से सरसंघचालक का चयन मनोनयन द्वारा होता है। वर्तमान में यह दायित्व मोहन भागवत के पास है।

संघ की शक्ति उसकी शाखाओं में निहित है। पूरे देश में प्रतिदिन लगभग 55,000 से अधिक शाखाएँ लगती हैं, जहाँ स्वयंसेवक व्यायाम, योग, खेल और बौद्धिक चर्चाओं के माध्यम से समाज और संस्कृति के प्रति जागरूकता विकसित करते हैं। प्रभात शाखा, सायं शाखा, रात्रि शाखा और मिलन जैसी विभिन्न शाखाएँ इस संगठन की जड़ों को गहराई से मजबूत करती हैं।

राष्ट्रीय संकटों में योगदान

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भी संघ ने कई अवसरों पर अपनी निर्णायक भूमिका निभाई। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने सीमा पर सहयोग किया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस तत्परता से प्रभावित हुए और 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण दिया। मात्र दो दिनों की तैयारी में तीन हजार स्वयंसेवक गणवेश पहनकर परेड में शामिल हुए।

दादरा-नगर हवेली और गोवा मुक्ति संग्राम में भी संघ की सक्रिय भूमिका रही। 1954 में दादरा-नगर हवेली को पुर्तगालियों से मुक्त कराने में स्वयंसेवकों ने तिरंगा फहराया। इसी तरह 1955 से गोवा मुक्ति आंदोलन में भी संघ कार्यकर्ताओं ने भागीदारी निभाई, जिसके परिणामस्वरूप कई स्वयंसेवकों को कठोर सजाएँ झेलनी पड़ीं। अंततः 1961 में सेना के हस्तक्षेप से गोवा आज़ाद हुआ।

आपातकाल : लोकतंत्र की रक्षा का संघर्ष

25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जाता है। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संघ पर प्रतिबंध लगाया और हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया।

फिर भी संघ का नेतृत्व भूमिगत रूप से सक्रिय रहा। प्रचारकों और कार्यवाहों ने लगातार सत्याग्रह की तैयारी, साहित्य वितरण और जनजागरण का कार्य जारी रखा। अनुमान है कि इस दौरान सवा लाख से अधिक स्वयंसेवक जेल गए और यातनाएँ झेलीं।

विदेशों में भी संघ ने ‘भारतीय स्वयंसेवक संघ’ और ‘फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के माध्यम से इमरजेंसी के खिलाफ जनमत तैयार किया। इंदिरा गांधी ने संघ को आंदोलन से अलग करने के लिए प्रतिबंध हटाने और कैदियों की रिहाई का प्रस्ताव रखा, लेकिन संघ ने स्पष्ट कर दिया कि ‘‘देश पहले है, संगठन बाद में’’।

1977 के आम चुनावों में जब जनता पार्टी विजयी हुई, तो लोकतंत्र की बहाली हुई और संघ को उसकी भूमिका के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।

आलोचना और विवाद

संघ को लेकर हमेशा विवाद उठते रहे हैं। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, हालांकि जाँच में यह आरोप सिद्ध नहीं हुआ और प्रतिबंध हटा लिया गया। आलोचक संघ को दक्षिणपंथी और हिंदूवादी संगठन बताते हैं, जबकि संघ का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल हिंदू समाज के सांस्कृतिक मूल्यों और अधिकारों की रक्षा करना है।

अयोध्या आंदोलन भी संघ से जुड़ा एक प्रमुख प्रसंग रहा, जिसने भारतीय राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। संघ की विचारधारा में हिंदुत्व को केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति के रूप में देखा जाता है। यही विचार इसके समर्थकों और विरोधियों के बीच लंबे समय तक बहस का विषय रहा।

शताब्दी की ओर

आज जब संघ अपने शताब्दी समारोह की तैयारी कर रहा है, तो उसकी यात्रा केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव की भी कहानी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और कई वरिष्ठ नेता स्वयं संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं, जिससे संगठन की राजनीतिक उपस्थिति और मजबूत होती है।

हालाँकि विपक्षी दल संघ की नीतियों और विचारधारा पर लगातार सवाल उठाते हैं, लेकिन इसके प्रभाव को नकारना आसान नहीं। संघ की शाखाएँ आज भी गाँव-गाँव, शहर-शहर में सक्रिय हैं और स्वयंसेवक सामाजिक, सांस्कृतिक और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य करते रहते हैं।

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Ruturaj Ravan

Ruturaj Ravan

यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।

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