178वीं जयंती पर खास: जानें कैसे राजा रवि वर्मा की कला ने बदली थी सौंदर्य की परिभाषा
राजा रवि वर्मा की 178वीं जयंती पर उनके जीवन, कला और योगदान को याद किया जा रहा है। 1848 में जन्मे और 1906 में निधन को प्राप्त इस महान चित्रकार ने भारतीय महाकाव्यों को चित्रों में जीवंत कर कला को जन-जन तक पहुँचाया। उनके लिथोग्राफ, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें भारतीय कला इतिहास का अमर स्तंभ बनाते हैं।

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार राजा रवि वर्मा
भारतीय चित्रकला के इतिहास में जिस नाम ने यूरोपीय अकादमिक कला और भारतीय सांस्कृतिक संवेदनाओं के बीच एक अद्वितीय सेतु का निर्माण किया, वह नाम है राजा रवि वर्मा। 29 अप्रैल 1848 को जन्मे इस महान चित्रकार की 178वीं जयंती (29 अप्रैल 2026) पर उनकी कला, जीवन और विरासत एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। उनकी रचनाएँ न केवल कला जगत की धरोहर हैं, बल्कि भारतीय जनमानस की सांस्कृतिक स्मृतियों का भी अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं।
राजा रवि वर्मा का जन्म तत्कालीन त्रावणकोर रियासत (वर्तमान केरल) के किलिमनूर पैलेस में हुआ था। वे परप्पनाड शाही परिवार से संबंध रखते थे, जो मलप्पुरम जिले से जुड़ा था। उनका परिवार त्रावणकोर राजघराने के साथ गहराई से जुड़ा हुआ था और लंबे समय तक राजपरिवारों को वैवाहिक संबंध प्रदान करता रहा। आगे चलकर उनकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ी कि वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की।
उनका विवाह मात्र 12 वर्ष की आयु में मवेलिक्करा राजघराने की भगीरथी बाई से हुआ था, जिनसे उनके पाँच बच्चे हुए दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ। उनके बड़े पुत्र केरल वर्मा आध्यात्मिक प्रवृत्ति के कारण जीवन भर अविवाहित रहे, जबकि छोटे पुत्र राम वर्मा ने अपने पिता की कलात्मक परंपरा को आगे बढ़ाया और मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में शिक्षा प्राप्त की।
राजा रवि वर्मा का कला जीवन त्रावणकोर के महाराजा अयिल्यम थिरुनाल के संरक्षण में प्रारंभ हुआ। उन्होंने मदुरै में चित्रकला की मूल शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर ब्रिटिश चित्रकार थियोडोर जेनसन से ऑयल पेंटिंग का प्रशिक्षण लिया। उनके कार्यों को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब 1873 के वियना प्रदर्शनी में उन्हें पुरस्कार मिला और 1893 के शिकागो विश्व प्रदर्शनी में उन्हें तीन स्वर्ण पदक प्राप्त हुए।
उन्होंने भारतीय महाकाव्यों महाभारत और पुराणों की कथाओं को अपनी कला में जीवंत किया। दुष्यंत-शकुंतला, नल-दमयंती जैसे प्रसंगों को उन्होंने ऐसी दृश्यात्मकता दी कि वे भारतीय कल्पना का स्थायी हिस्सा बन गए। देवी-देवताओं के चित्रण में उन्होंने भारतीय महिलाओं को मॉडल बनाकर सौंदर्य और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। उनकी लिथोग्राफिक तकनीक ने कला को आम जनता तक पहुँचाया और चित्रकला को अभिजात वर्ग से निकालकर जनमानस की धरोहर बना दिया।
हालाँकि उनकी शैली को कुछ आलोचकों ने अत्यधिक अलंकृत और भावनात्मक माना, लेकिन उनकी लोकप्रियता आज भी भारतीय कला जगत में अद्वितीय बनी हुई है। उनके अनेक महत्वपूर्ण चित्र वडोदरा के लक्ष्मी विलास पैलेस सहित कई संग्रहालयों में संरक्षित हैं।
1900 में उनकी पुत्रियों की संतानों को त्रावणकोर राजघराने में दत्तक लिया गया, जिससे उनका शाही संबंध और अधिक सुदृढ़ हुआ। जीवन के अंतिम वर्षों में वे मधुमेह से पीड़ित रहे और अंततः 2 अक्टूबर 1906 को किलिमनूर पैलेस स्थित अपने आवास पर उनका निधन हो गया। मात्र 58 वर्ष की आयु में उनका जीवन समाप्त हो गया, लेकिन उनकी कला आज भी अमर है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
